४. अड्ढसमवुत्तिनिद्देस-चतुत्थपरिच्छेद
विसमे यदि सा स,ल,गा समे,
भ,त्तयतो गरुका वु’पचित्तं॥
भ,त्तयतो यदि गा दुतमज्झा।
यदि पुनरे’व भवन्ति न, जा ज्या॥
यदि स,त्तितयं गरुयुत्तं,
वेगवती यदि भ,त्तितया गा॥
तो जो विसमे रतो गरू चे।
स्मा ज्गा भद्दविराज मेत्थ गो चे॥
विसमे स, जा स,गरु,युत्ता।
केतुमती समे भ,र,न,गा गो॥
आख्यानकी ता विसमे ज, गा गो। (इन्दवजिर)
ज,ता ज,गा गो तु समे’थ पादे॥ (उपेन्दवजिर)
ज,ता ज,गा गो विसमे समे तु। (उपेन्दवजिर)
ता जो ग,गा चे विपरीतपुब्बा॥ (इन्दवजिर)
स,स,तो स,ल,गा विसमे समे।
न,भ,भ,रा भवते हरिणप्लुता॥
यदि न,न,र,ल,गा न,जा ज,रा,
यदि च तदा’परवत्त मिच्छति॥
विसम मुपगता न,ना र,या चे।
न,ज,ज,र,गा समके च पुप्फितग्गा॥
द्वयं मिदं वेतालीय’प्पभेदो।
सा यवादिका मती र,जा र,जा त्व,
समे समे ज,रा ज,रा गरू भवेय्युं॥
इति वुत्तोदये छन्दसि अड्ढसमवुत्तिनिद्देसो नाम
चतुत्थो परिच्छेदो।