भिक्खुनीविभङ्गो
भिक्खुनीविभङ्गो
भिक्खूनं पाटवत्थाय, विनयस्स विनिच्छये।
भिक्खुनीनं विभङ्गोपि, किञ्चिमत्तं भणामहं॥
अवस्सुतस्स पोसस्स, भिक्खुनीपि अवस्सुता।
नन्दन्ती कायसंसग्गं, कति आपत्तियो फुसे।
तिस्सो आपत्तियो उब्भ-जाणुस्साधक्खकस्स च।
होति पाराजिकं तस्सा, गहणं सादियन्तिया॥
उब्भक्खकं अधोजाणु-गहणं सादियन्तिया।
थुल्लच्चयं सिया, काय-पटिबद्धे तु दुक्कटं॥
छादेन्ती भिक्खुनी वज्जं, तिस्सो आपत्तियो फुसे।
जानं पाराजिकं धम्मं, छादेन्ती सा पराजिका॥
थुल्लच्चयं वेमतिका, पटिच्छादेति चे पन।
अथाचारविपत्तिं चे, पटिच्छादेति दुक्कटं॥
निस्सज्जन्ती न तं लद्धिं, उक्खित्तस्सानुवत्तिका।
समनुभासनायेव, तिस्सो आपत्तियो फुसे॥
ञत्तिया दुक्कटं, द्वीहि, कम्मवाचाहि थुल्लता।
कम्मवाचाय ओसाने, पाराजिकमुदीरितं॥
पूरेन्ती अट्ठमं वत्थुं, तिस्सो आपत्तियो फुसे।
पुरिसेनिधागच्छाति, वुत्तागच्छति दुक्कटं॥
थुल्लच्चयं तु पोसस्स, हत्थपासप्पवेसने।
पूरेन्ती अट्ठमं वत्थुं, समणी सा पराजिता॥
पाराजिककथा।
उस्सयवादिका अट्टं, करोन्ती तिविधं फुसे।
एकस्सारोचने तस्सा, होति आपत्ति दुक्कटं॥
दुतियारोचने तस्सा, थुल्लच्चयमुदीरितं।
अट्टस्स परियोसाने, होति सङ्घादिसेसता॥
चोरिवुट्ठापिका वापि, ञत्तिया दुक्कटं फुसे।
द्वीहि थुल्लच्चयं कम्म-वाचोसाने गरुं सिया॥
एका गामन्तरं गच्छे, गमने दुक्कटं सिया।
परिक्खेपे अतिक्कन्ते, पादेन पठमेन तु॥
होति थुल्लच्चयापत्ति, तस्सा समणिया पन।
दुतियेन अतिक्कन्ते, गरुके पन तिट्ठति॥
चतुत्थे दुतिये वुत्त-सदिसोव विनिच्छयो।
आपत्तीनं पभेदे तु, काचि नत्थि विसेसता॥
अवस्सुता सयं हुत्वा, तादिसस्सेव हत्थतो।
गहेत्वा पन भुञ्जन्ती, भोजनादीसु किञ्चिपि॥
फुसे आपत्तियो तिस्सो, भोजनादीसु किञ्चिपि।
पटिग्गण्हन्तिया तस्सा, होति थुल्लच्चयं पन॥
अज्झोहारेसु सब्बेसु, होति सङ्घादिसेसता।
उदकं दन्तपोनं वा, पटिग्गण्हाति दुक्कटं॥
‘‘सहत्थेन गहेत्वा त्वं, खाद वा भुञ्ज वा’’तिपि।
उय्योजेन्ती पनेवं तु, तिस्सो आपत्तियो फुसे॥
दुक्कटं वचने तस्सा, ‘‘भुञ्जिस्सामी’’ति गण्हति।
अज्झोहारेसु सब्बेसु, तस्सा थुल्लच्चयं सिया॥
भोजनस्स पनोसाने, होति सङ्घादिसेसता।
उय्योजेति च या तस्सा, इमा तिस्सोति दीपये॥
सत्तमे अट्ठमे चापि, नवमे दसमेपि च।
चोरिवुट्ठापनेनेव, समानोव विनिच्छयो॥
सङ्घादिसेसकथा।
पत्तसन्निचयं यिह, करोन्ती भिक्खुनी पन।
एकं निस्सग्गियंयेव, फुसे पाचित्तियं तु सा॥
अकालचीवरं काल-चीवरं भाजापेन्तिया।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, लाभे निस्सग्गियं सिया॥
चीवरं परिवत्तेत्वा, अच्छिन्दति सचे पन।
पयोगे दुक्कटं, छिन्ने, तस्सा निस्सग्गियं सिया॥
विञ्ञापेत्वाव अञ्ञं चे, विञ्ञापेति ततो परं।
पयोगे दुक्कटं, विञ्ञा-पिते निस्सग्गियं सिया॥
चेतापेत्वा हि अञ्ञं चे, चेतापेति ततो परं।
पयोगे दुक्कटं, चेता-पिते निस्सग्गियं सिया॥
एवमेव च सेसेसु, छट्ठादीसु च सत्तसु।
अनन्तरसमानोव, आपत्तीनं विनिच्छयो॥
निस्सग्गियकथा।
लसुणं खादति द्वे चे, दुक्कटं गहणे सिया।
अज्झोहारपयोगेसु, पाचित्ति परियापुता॥
संहरापेन्तिया लोमं, सम्बाधे द्वेव होन्ति हि।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, होति पाचित्ति संहटे॥
करोन्ती तलघातं तु, द्वे पनापत्तियो फुसे।
पयोगे दुक्कटं होति, कते पाचित्तियं सिया॥
जतुना मट्ठकं किञ्चि, सादियन्ती दुवे फुसे।
पयोगे दुक्कटादिन्ने, तस्सा पाचित्तियं सिया॥
पञ्चमं तु चतुत्थेन, समानमिति दीपये।
आपत्तीनं विभागस्मिं, विसेसो नत्थि कोचिपि॥
भिक्खुस्स भुञ्जमानस्स, पानीयेनुपतिट्ठति।
हत्थपासे तु पाचित्ति, हित्वा तिट्ठति दुक्कटं॥
विञ्ञापेत्वामकं धञ्ञं, ‘‘भुञ्जिस्सामी’’ति गण्हति।
दुक्कटं होति पाचित्ति, अज्झोहारेसु दीपये॥
उच्चारादिं तिरोकुट्टे, छड्डेन्ती द्वे फुसे हवे।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, पाचित्ति छड्डिते सिया॥
उच्चारादिचतुक्कं तु, छड्डेति हरिते सचे।
पयोगे दुक्कटं तस्सा, पाचित्ति छड्डिते सिया॥
नच्चादिं दस्सनत्थाय, सचे गच्छति दुक्कटं।
पस्सन्तियापि पाचित्ति, तथेव च सुणन्तिया॥
लसुणवग्गो पठमो।
पठमे दुतिये चेव, ततिये च चतुत्थके।
तुल्यो लसुणवग्गस्स, छट्ठेनिध विनिच्छयो॥
कुलानि उपसङ्कम्म, निसीदित्वा पनासने।
सामिके तु अनापुच्छा, पक्कमन्ती दुवे फुसे॥
पठमेन च पादेन, अनोवस्समतिक्कमे।
दुक्कटं होति, पाचित्ति, दुतियातिक्कमे सिया॥
सामिके तु अनापुच्छा, आसने चे निसीदति।
पयोगे दुक्कटं होति, पाचित्ति च निसीदिते॥
छट्ठेन सत्तमं सब्बं, समानं अट्ठमे पन।
पयोगे दुक्कटं, उज्झा-पिते पाचित्तियं सिया॥
अत्तानं चाभिसप्पेन्ती, द्वे फुसे निरयादिना।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, पाचित्ति अभिसप्पिते॥
वधित्वा पन अत्तानं, रोदन्ती तु दुवे फुसे।
वधति रोदति पाचित्ति, करोतेकं तु दुक्कटं॥
रत्तन्धकारवग्गो दुतियो।
नग्गा न्हायति द्वे चेव, पयोगे दुक्कटं सिया।
न्हानस्स परियोसाने, तस्सा पाचित्तियं सिया॥
कारापेति पमाणाति-क्कन्तं उदकसाटिकं।
पयोगे दुक्कटं, कारा-पिते पाचित्तियं सिया॥
चीवरं तु विसिब्बेत्वा, विसिब्बापेत्व वा पन।
नेव सिब्बन्तिया वुत्त-मेकं पाचित्तियं पन॥
पञ्चाहिकं तु सङ्घाटि-चारं पन अतिक्कमे।
एकावस्सा पनापत्ति, पाचित्ति परिदीपिता॥
सचे सङ्कमनीयं तु, धारेति पन चीवरं।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, पाचित्ति पन धारिते॥
गणचीवरलाभस्स, अन्तरायं करोति चे।
पयोगे दुक्कटं होति, कते पाचित्तियं सिया॥
विभङ्गं पटिबाहन्ती, चीवरानं तु धम्मिकं।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, पाचित्ति पटिबाहिते॥
अगारिकादिनो देति, सचे समणचीवरं।
पयोगे दुक्कटं, दिन्ने, पाचित्ति परियापुता॥
चीवरे दुब्बलासाय, कालं चे समतिक्कमे।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, पाचित्ति समतिक्कमे॥
धम्मिकं कथिनुद्धारं, पटिबाहन्तिया दुवे।
पयोगे दुक्कटं होति, पाचित्ति पटिबाहिते॥
न्हानवग्गो ततियो।
दुवे भिक्खुनियो एक-मञ्चस्मिं चे तुवट्टेय्युं।
पयोगे दुक्कटं तासं, निपन्ने इतरं सिया॥
दुतियं पठमेनेव, सदिसं ततिये पन।
पयोगे दुक्कटं होति, कते पाचित्तियं सिया॥
नुपट्ठापेन्तिया वापि, दुक्खितं सहजीविनिं।
एकायेव पनापत्ति, पाचित्ति परिदीपिता॥
सचे उपस्सयं दत्वा, निक्कड्ढति च भिक्खुनिं।
पयोगे दुक्कटं तस्सा, होति पाचित्ति कड्ढिते॥
छट्ठे पन च संसट्ठा, ञत्तिया दुक्कटं फुसे।
कम्मवाचाय ओसाने, पाचित्ति परिदीपिता॥
अन्तोरट्ठे तु सासङ्के, चारिकं तु चरन्तिया।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, पटिपन्नाय सेसकं॥
अट्ठमं नवमञ्चेव, सत्तमेन समं मतं।
दसमे पन एकाव, पाचित्ति परिदीपिता॥
तुवट्टवग्गो चतुत्थो।
राजागारादिकं सब्बं, दस्सनत्थाय गच्छति।
पयोगे दुक्कटं तस्सा, पाचित्ति यदि पस्सति॥
आसन्दिं वापि पल्लङ्कं, परिभुञ्जन्तिया दुवे।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, भुत्ते पाचित्तियं सिया॥
सुत्तं कन्तन्तिया द्वेव, पयोगे दुक्कटं मतं।
उज्जवुज्जवने तस्सा, पाचित्ति समुदाहरे॥
वेय्यावच्चं गिहीनं तु, द्वेव होन्ति करोन्तिया।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, कते पाचित्तियं सिया॥
पञ्चमे पन एकाव, पाचित्ति परिदीपिता।
पयोगे दुक्कटं छट्ठे, दिन्ने पाचित्तियं सिया॥
सत्तमं दुतियेनेव, समापत्तिपभेदतो।
अट्ठमं दुतिये वग्गे, पञ्चमेन समं मतं॥
तिरच्छानगतं विज्जं, द्वेव होन्ति पठन्तिया।
पयोगे दुक्कटं होति, पाचित्ति हि पदे पदे॥
दसमं नवमेनेव, समानं सब्बथा पन।
‘‘परियापुणाति, वाचेति’’, पदमत्तं विसेसकं॥
चित्तागारवग्गो पञ्चमो।
सभिक्खुकं तमारामं, जानन्ती पन भिक्खुनी।
पविसन्ती अनापुच्छा, द्वे पनापत्तियो फुसे॥
पठमेन च पादेन, परिक्खेपस्सतिक्कमे।
दुक्कटं पिटके वुत्तं, पाचित्ति दुतियेन तु॥
अक्कोसति च या भिक्खुं, भिक्खुनी परिभासति।
पयोगे दुक्कटं तस्सा, पाचित्तक्कोसिते सिया॥
या हि चण्डिकभावेन, गणं तु परिभासति।
पयोगे दुक्कटं तस्सा, परिभट्ठे पनेतरं॥
निमन्तिता पवारिता, खादनं भोजनम्पि वा।
भुञ्जन्ती भिक्खुनी सा हि, द्वे पनापत्तियो फुसे॥
‘‘भुञ्जिस्सामी’’ति यं किञ्चि, पटिग्गण्हाति दुक्कटं।
अज्झोहारपयोगेसु, पाचित्ति परिदीपये॥
कुलं तु मच्छरायन्ती, द्वे पनापत्तियो फुसे।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, सेसा मच्छरिते सिया॥
अभिक्खुके पनावासे, भवे वस्सं वसन्तिया।
दुक्कटं पुब्बकिच्चेसु, पाचित्ति अरुणुग्गमे॥
भिक्खुनी उभतोसङ्घे, वस्संवुट्ठा तु तीहिपि।
ठानेहि अप्पवारेन्ती, एकं पाचित्तियं फुसे॥
ओवादत्थाय वा भिक्खुं, संवासत्थाय वा तथा।
न गच्छति सचे तस्सा, एकं पाचित्तियं सिया॥
ओवादम्पि न याचन्ती, न गच्छन्ती उपोसथं।
एकं पाचित्तियापत्ति-मापज्जति, न संसयो॥
अपुच्छित्वाव सङ्घं वा, भेदापेति पसाखजं।
पयोगे दुक्कटं, भिन्ने, पाचित्ति परियापुता॥
आरामवग्गो छट्ठो।
गब्भिनिं वुट्ठपेन्ती हि, द्वे पनापत्तियो फुसे।
पयोगे दुक्कटं, वुट्ठा-पिते पाचित्तियं सिया॥
दुतियं ततियञ्चेव, चतुत्थं पञ्चमम्पि च।
छट्ठञ्च सत्तमञ्चेव, पठमेन समं मतं॥
भिक्खुनी वुट्ठपेत्वान, भिक्खुनिं सहजीविनिं।
द्वेवस्सं नानुग्गण्हन्ती, एकं पाचित्तियं फुसे॥
नवमं दसमञ्चेव, अट्ठमेन समं मतं।
द्वीसु आपत्तिभेदस्मिं, नानत्तं नत्थि किञ्चिपि॥
गब्भिनीवग्गो सत्तमो।
कुमारीभूतवग्गस्स, आदितो पन पञ्चपि।
समाना गब्भिनीवग्गे, पठमेनेव सब्बसो॥
‘‘अलं वुट्ठापितेना’’ति, वुच्चमाना हि खीयति।
पयोगे दुक्कटं, पच्छा, होति पाचित्ति खीयिते॥
सत्तमे अट्ठमे चेव, एकं पाचित्तियं मतं।
आदिनाव समानानि, नवमादीनि पञ्चपि॥
कुमारीभूतवग्गो अट्ठमो।
आपत्तियो फुसे द्वेपि, धारेन्ती छत्तुपाहनं।
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, होति पाचित्ति धारिते॥
यानेन पन यायन्ती, द्वे किरापत्तियो फुसे।
पयोगे दुक्कटं होति, पाचित्ति यदि यायिते॥
धारेन्तिया तु सङ्घाणिं, पयोगे दुक्कटं सिया।
धारिते पन पाचित्ति, चतुत्थेपि अयं नयो॥
न्हायन्ती गन्धवण्णेन, पयोगे दुक्कटं फुसे।
न्हानस्स परियोसाने, तस्सा पाचित्तियं सिया॥
छट्ठम्पि पञ्चमेनेव, समानं सब्बथा पन।
सत्तमे अट्ठमे चेव, नवमे दसमेपि च॥
पयोगे दुक्कटं वुत्तं, पाचित्तुम्मद्दिते सिया।
आपत्तीनं विभागस्मिं, नत्थि काचि विसेसता॥
अनापुच्छा तु भिक्खुस्स, पुरतो या निसीदति।
पयोगे दुक्कटं तस्सा, पाचित्ति तु निसीदिते॥
अनोकासकतं भिक्खुं, पञ्हं पुच्छन्तिया पन।
पयोगे दुक्कटं होति, वुत्ता पाचित्ति पुच्छिते॥
संकच्चिकं विना गामं, पदसा पविसन्तिया।
पठमेनेव आराम-वग्गस्स सदिसं वदे॥
छत्तुपाहनवग्गो नवमो।
पाचित्तियकथा।
अट्ठसु दुविधापत्ति, पाटिदेसनियेसुपि।
विञ्ञापेत्वा सचे सप्पिं, ‘‘भुञ्जिस्सामी’’ति गण्हति॥
ततो भिक्खुनिया तस्सा, होति आपत्ति दुक्कटं।
अज्झोहारेसु सब्बेसु, पाटिदेसनियं सिया॥
पाटिदेसनीयकथा।
इमं विदित्वा परमं पनुत्तरं।
निरुत्तरं अत्थवसेन भिक्खु।
सुखेन पञ्ञत्तमहासमुद्दं।
दुरुत्तरं उत्तरतेव धीरो॥
यस्मा तस्मा अस्मिं योगं।
उस्मायुत्तो युत्तो कातुं।
सत्तो सत्तो कङ्खच्छेदे।
सत्थे सत्थे निच्चं निच्चं॥
भिक्खुनीविभङ्गो निट्ठितो।
चतुविपत्तिकथा
कति आपत्तियो सील-विपत्तिपच्चया पन।
चतस्सोव सियुं सील-विपत्तिपच्चया पन॥
जानं पाराजिकं धम्मं, सचे छादेति भिक्खुनी।
चुता, थुल्लच्चयं होति, सचे वेमतिका सिया॥
पाचित्ति भिक्खु सङ्घादि-सेसं छादेति चे पन।
अत्तनो पन दुट्ठुल्लं, छादेन्तो दुक्कटं फुसे॥
आपत्तियो कताचार-विपत्तिपच्चया पन।
एकायेव सियाचार-विपत्तिपच्चया पन॥
पटिच्छादेति आचार-विपत्तिं पन भिक्खु चे।
एकमेवस्स भिक्खुस्स, होति आपत्ति दुक्कटं॥
कति आपत्तियो दिट्ठि-विपत्तिपच्चया पन?
द्वे पनापत्तियो दिट्ठि-विपत्तिपच्चया सियुं॥
अच्चजं पापिकं दिट्ठिं, ञत्तिया दुक्कटं फुसे।
कम्मवाचाय ओसाने, पाचित्ति परियापुता॥
आपत्तियो कताजीव-विपत्तिपच्चया पन?
छळेवापज्जताजीव-विपत्तिपच्चया पन॥
अधिकरणपच्चयकथा
विवादाधिकरणम्हा, कति आपत्तियो सियुं?
विवादाधिकरणम्हा, द्वे पनापत्तियो सियुं॥
पाचित्ति उपसम्पन्नं, होति ओमसतो पन।
भिक्खुस्सानुपसम्पन्नं, ओमसन्तस्स दुक्कटं॥
अनुवादाधिकरण-पच्चयापत्तियो कति?
अनुवादाधिकरण-पच्चया तिविधा सियुं॥
अनुद्धंसेति चे भिक्खुं, अमूलन्तिमवत्थुना।
सङ्घादिसेसमापत्ति-मापज्जति, न संसयो॥
तथा सङ्घादिसेसेन, अनुद्धंसेति चे पन।
पाचित्ति, दुक्कटं वुत्तं, तथाचारविपत्तिया॥
आपत्तिपच्चया वुत्ता, कति आपत्तियो पन?
आपत्तिपच्चया वुत्ता, चतस्सोव महेसिना॥
जानं पाराजिकं धम्मं, सचे छादेति भिक्खुनी।
चुता, थुल्लच्चयं होति, सचे वेमतिका सिया॥
पाचित्ति भिक्खु सङ्घादि-सेसं छादेति चे पन।
तथाचारविपत्तिं तु, सचे छादेति दुक्कटं॥
खन्धकपुच्छाकथा
खन्धकेसुपि आपत्ति-पभेदं आगतं पन।
पाटवत्थाय भिक्खूनं, पवक्खामि निबोधथ॥
खन्धके पठमे ताव, कति आपत्तियो सियुं?
खन्धके पठमे ताव, द्वे पनापत्तियो सियुं॥
ऊनवीसतिवस्सं तु, करोतो उपसम्पदं।
होति पाचित्तियं तस्स, सेसेसु पन दुक्कटं॥
कति आपत्तियो होन्ति।
खन्धके तु उपोसथे?
तिस्सो आपत्तियो होन्ति।
खन्धके तु उपोसथे॥
‘‘नस्सन्तेते विनस्सन्तु’’, इति भेदपुरक्खका।
उपोसथस्स करणे, थुल्लच्चयमुदीरितं॥
उक्खित्तकेन सद्धिं तु, करोन्तस्स उपोसथं।
होति पाचित्तियं तस्स, सेसेसु पन दुक्कटं॥
कति आपत्तियो वुत्ता, वद वस्सूपनायिके?
एकाव दुक्कटापत्ति, वुत्ता वस्सूपनायिके॥
समुट्ठानसीसकथा
विभङ्गेसु पन द्वीसु, पञ्ञत्तानि महेसिना।
यानि पाराजिकादीनि, उद्दिसन्ति उपोसथे॥
तेसं दानि पवक्खामि, समुट्ठानमितो परं।
पाटवत्थाय भिक्खूनं, तं सुणाथ समाहिता॥
कायो च वाचापि च कायवाचा।
तानेव चित्तेन युतानि तीणि।
एकङ्गिकं द्वङ्गितिवङ्गिकन्ति।
छधा समुट्ठानविधिं वदन्ति॥
तेसु एकेन वा द्वीहि, तीहि वाथ चतूहि वा।
छहि वापत्तियो नाना-समुट्ठानेहि जायरे॥
तत्थ पञ्चसमुट्ठाना, का चापत्ति न विज्जति।
होति एकसमुट्ठाना, पच्छिमेहेव तीहिपि॥
तथेव द्विसमुट्ठाना, कायतो कायचित्ततो।
वाचतो वाचचित्तम्हा, ततियच्छट्ठतोपि च॥
चतुत्थच्छट्ठतो चेव, पञ्चमच्छट्ठतोपि च।
जायते पञ्चधावेसा, समुट्ठाति न अञ्ञतो॥
एकुत्तरनयकथा
कति आपत्तियो होन्ति, समुट्ठानेन आदिना?
पञ्च आपत्तियो होन्ति, कुटिं संयाचिकाय तु॥
करोतो पन तिस्सोव, पयोगे दुक्कटादयो।
विकाले पन पाचित्ति, तथा अञ्ञातिहत्थतो॥
गहेत्वा भुञ्जतो वुत्तं, पाटिदेसनियम्पि च।
पञ्चिमापत्तियो होन्ति, समुट्ठानेन आदिना॥
कति =०४ आपत्तियो होन्ति, दुतियेन तुवं भण?
आपत्तियो चतस्सोव, होन्तीति परिदीपये॥
‘‘कुटिं मम करोथा’’ति, समादिसति भिक्खु चे।
करोन्ति चे कुटिं तस्स, विपन्नं सब्बथा पन॥
तिस्सो पुरिमनिद्दिट्ठा, पयोगे दुक्कटादयो।
पदसोधम्ममूलेन, चतस्सोव भवन्तिमा॥
ततियेन कति जायन्ति, समुट्ठानेन मे भण?
ततियेन तुवं ब्रूमि, पञ्चधापत्तियो सियुं॥
भिक्खु संविदहित्वान।
करोति च कुटिं सचे।
सेदमोचनकथा
इतो परं पवक्खामि, भिक्खूनं सुणतं पुन।
सेदमोचनगाथायो, पटुभावकरा वरा॥
उब्भक्खकं विवज्जेत्वा, अधोनाभिं विवज्जिय।
पटिच्च मेथुनं धम्मं, कथं पाराजिको सिया?
कबन्धसत्तकायस्स, उरे होति मुखं सचे।
मुखेन मेथुनं धम्मं, कत्वा पाराजिको भवे॥
सुञ्ञे निस्सत्तके दीपे, एको भिक्खु सचे वसे।
मेथुनपच्चया तस्स, कथं पाराजिको सिया?
लम्बी वा मुदुपिट्ठी वा, वच्चमग्गे मुखेपि वा।
अङ्गजातं पवेसेन्तो, सके पाराजिको भवे॥
सयं नादियते किञ्चि, परञ्च न समादपे।
संविधानञ्च नेवत्थि, कथं पाराजिको सिया?
सुङ्कघाते अतिक्कन्ते, नादियन्तो परस्स तु।
आणत्तिञ्च विनायेव, होति पाराजिको यति॥
हरन्तो गरुकं भण्डं, थेय्यचित्तेन पुग्गलो।
परस्स तु परिक्खारं, न च पाराजिको कथं?
साधारणासाधारणकथा
सब्बसिक्खापदानाहं , निदानं गणनम्पि च।
भिक्खूहि भिक्खुनीनञ्च, भिक्खूनं भिक्खुनीहि च॥
असाधारणपञ्ञत्तं, तथा साधारणम्पि च।
पवक्खामि समासेन, तं सुणाथ समाहिता॥
निदानं नाम वेसाली, तथा राजगहं पुरं।
सावत्थाळवि कोसम्बी, सक्कभग्गा पकासिता॥
कति वेसालिया वुत्ता, कति राजगहे कता?
कति सावत्थिपञ्ञत्ता, कति आळवियं कता?
कति कोसम्बिपञ्ञत्ता, कति सक्केसु भासिता?
कति भग्गेसु पञ्ञत्ता, तं मे अक्खाहि पुच्छितो?
दस वेसालिया वुत्ता, एकवीस गिरिब्बजे।
छऊनानि सतानेव, तीणि सावत्थियं कता॥
छ पनाळवियं वुत्ता, अट्ठ कोसम्बियं कता।
अट्ठ सक्केसु पञ्ञत्ता, तयो भग्गेसु दीपिता॥
मेथुनं विग्गहो चेव, चतुत्थन्तिमवत्थुकं।
अतिरेकचीवरं सुद्ध-काळकेळकलोमकं॥
लक्खणकथा
इतो परं पवक्खामि, लक्खणं पन सब्बगं।
सवने सादरं कत्वा, वदतो मे निबोधथ॥
निदानं पुग्गलो वत्थु, पञ्ञत्तिविधिमेव च।
विपत्तापत्तनापत्ति, आणत्तङ्गकिरियापि च॥
सञ्ञाचित्तसमुट्ठानं, वज्जकम्मपभेदकं।
तिकद्वयन्ति सब्बत्थ, योजेतब्बमिदं पन॥
पुब्बे वुत्तनयं यञ्च, यञ्च उत्तानमेविध।
तं सब्बं पन वज्जेत्वा, करिस्सामत्थजोतनं॥
पुग्गलो नाम यं यं तु, भिक्खुमारब्भ भिक्खुनिं।
सिक्खापदं तु पञ्ञत्तं, अयं वुच्चति पुग्गलो॥
तेवीसतिविधा ते च, सुदिन्नधनियादयो।
भिक्खूनं पातिमोक्खस्मिं, आदिकम्मिकपुग्गला॥
भिक्खुनीनं तथा पाति-मोक्खस्मिं आदिकम्मिका।
थुल्लनन्दादयो सत्त, सब्बे तिंस भवन्ति हि॥
वत्थूति पुग्गलस्सेव, तस्स तस्स च सब्बसो।
वत्थुनो तस्स तस्सेव, अज्झाचारो पवुच्चति॥
निगमनकथा
रचितो बुद्धदत्तेन, सुद्धचित्तेन धीमता।
सुचिरट्ठितिकामेन, सासनस्स महेसिनो॥
अन्तरेनन्तरायं तु, यथा सिद्धिमुपागतो।
अत्थतो गन्थतो चेव, उत्तरोयमनुत्तरो॥
तथा सिज्झन्तु सङ्कप्पा, सत्तानं धम्मसंयुता।
राजा पातु महिं सम्मा, काले देवो पवस्सतु॥
याव तिट्ठति सेलिन्दो, याव चन्दो विरोचति।
ताव तिट्ठतु सद्धम्मो, गोतमस्स महेसिनो॥
खन्तिसोरच्चसोसील्य-बुद्धिसद्धादयादयो।
पतिट्ठिता गुणा यस्मिं, रतनानीव सागरे॥
विनयाचारयुत्तेन, तेन सक्कच्च सादरं।
याचितो सङ्घपालेन, थेरेन थिरचेतसा॥
सुचिरट्ठितिकामेन , विनयस्स महेसिनो।
भिक्खूनं पाटवत्थाय, विनयस्स विनिच्छये॥
अकासिं परमं एतं, उत्तरं नाम नामतो।
सवने सादरं कत्वा, सिक्खितब्बो ततो अयं॥
आजीवहेतु पापिच्छो, असन्तं पन अत्तनि।
मनुस्सुत्तरिधम्मं तु, वदं पाराजिकं फुसे॥
सञ्चरित्तं समापन्नो, होति सङ्घादिसेसता।
परियायवचने ञाते, तस्स थुल्लच्चयं सिया॥
पणीतभोजनं वत्वा, पाचित्ति परिभुञ्जतो।
भिक्खुनी तु सचे होति, पाटिदेसनियं सिया॥
आजीवहेतु सूपं वा, ओदनं वा पनत्तनो।
अत्थाय विञ्ञापेत्वान, दुक्कटं परिभुञ्जतो॥
आपत्तियो हि किच्चाधि-करणपच्चया कति?
पञ्चेव होन्ति किच्चाधि-करणपच्चया पन॥
समनुभासनायेव, ञत्तिया दुक्कटं फुसे।
समणी अच्चजन्तीव, उक्खित्तस्सानुवत्तिका॥
थुल्लच्चयं द्वयं द्वीहि, कम्मवाचाहि सा फुसे।
कम्मवाचाय ओसाने, तस्सा पाराजिकं सिया॥
समनुभासनायेव, भेदकस्सानुवत्तिका।
न परिच्चजति तं लद्धिं, होति सङ्घादिसेसता॥
समनुभासनायेव, पापिकाय च दिट्ठिया।
यावततियकं तस्सा, पाचित्तच्चजतोपि च॥
कति आपत्तियो वुत्ता, खन्धके तु पवारणे?
तिस्सो आपत्तियो वुत्ता, उपोसथसमा मता॥
कति आपत्तियो वुत्ता, चम्मे? तिस्सोव दीपिता।
मारेन्तानं तु पाचित्ति, गहेत्वा वच्छतरिं पन॥
अङ्गजातं छुपन्तस्स, रत्तेन पन चेतसा।
तस्स थुल्लच्चयं वुत्तं, सेसेसु पन दुक्कटं॥
कति आपत्तियो वुत्ता, भेसज्जक्खन्धके पन?
तिस्सो आपत्तियो वुत्ता, भेसज्जक्खन्धके पन॥
समन्ता द्वङ्गुले तत्थ, थुल्लच्चयमुदीरितं।
भोज्जयागूसु पाचित्ति, सेसेसु पन दुक्कटं॥
कथिने नत्थि आपत्ति, पञ्ञत्तं केवलं पन।
कति चीवरसंयुत्ते, वुत्ता आपत्तियो पन?
तिस्सो चीवरसंयुत्ते, वुत्ता आपत्तियो पन।
कुसवाकमये चीरे, थुल्लच्चयमुदीरितं॥
सनिस्सग्गाव पाचित्ति, अतिरेके तु चीवरे।
सेसेसु दुक्कटं वुत्तं, बुद्धेनादिच्चबन्धुना॥
चम्पेय्यके च कोसम्बे, कम्मस्मिं पारिवासिके।
तथा समुच्चये एका, दुक्कटापत्ति दीपिता॥
कति आपत्तियो वुत्ता, समथक्खन्धके पन?
द्वेयेवापत्तियो वुत्ता, समथक्खन्धके पन॥
छन्दस्स दायको भिक्खु, पाचित्ति यदि खीयति।
सेसेसु पन सब्बत्थ, दुक्कटं समुदाहटं॥
कति खुद्दकवत्थुस्मिं, वुत्ता आपत्तियो पन?
तिस्सो खुद्दकवत्थुस्मिं, वुत्ता आपत्तियो पन॥
अत्तनो अङ्गजातं तु, छिन्दं थुल्लच्चयं फुसे।
रोमन्थे होति पाचित्ति, सेसे आपत्ति दुक्कटं॥
तथा सेनासनस्मिं तु, तिस्सो आपत्तियो सियुं।
विस्सज्जने च गरुनो, थुल्लच्चयमुदीरितं॥
निक्कड्ढने च पाचित्ति, सङ्घिकम्हा विहारतो।
सेसेसु पन सब्बत्थ, दुक्कटं समुदाहटं॥
कति आपत्तियो सङ्घ-भेदे वुत्ता महेसिना?
द्वे पनापत्तियो सङ्घ-भेदे वुत्ता महेसिना॥
भेदानुवत्तकानं तु, थुल्लच्चयमुदीरितं।
गणभोगे तु भिक्खूनं, पाचित्ति परिदीपिता॥
खन्धके वत्तसंयुत्ते, कति आपत्तियो मता?
खन्धके वत्तसंयुत्ते, दुक्कटापत्तियेव सा॥
ठपने पातिमोक्खस्स, तथा एकाव दीपिता।
भिक्खुनिक्खन्धके चापि, कति आपत्तियो मता?
भिक्खुनिक्खन्धके चापि, द्वे पनापत्तियो मता।
अपवारणाय पाचित्ति, सेसेसु पन दुक्कटं॥
तिसमुट्ठानिका नाम, पठमेहि च तीहिपि।
पच्छिमेहि च तीहेव, समुट्ठाति न अञ्ञतो॥
पठमा ततिया चेव, चतुत्थच्छट्ठतोपि च।
दुतिया ततिया चेव, पञ्चमच्छट्ठतोपि च॥
द्विधा चतुसमुट्ठाना, जायते न पनञ्ञतो।
एकधा छसमुट्ठाना, समुट्ठाति छहेव हि॥
‘‘तिधा एकसमुट्ठाना, पञ्चधा द्विसमुट्ठिता।
द्विधा तिचतुरो ठाना, एकधा छसमुट्ठिता’’॥
तेरसेव च नामानि, समुट्ठानविसेसतो।
लभन्तापत्तियो सब्बा, तानि वक्खामितो परं॥
पठमन्तिमवत्थुञ्च, दुतियं सञ्चरित्तकं।
समनुभासनञ्चेव, कथिनेळकलोमकं॥
पदसोधम्ममद्धानं, थेय्यसत्थञ्च देसना।
भूतारोचनकञ्चेव, चोरिवुट्ठापनम्पि च॥
अननुञ्ञातकञ्चाति, सीसानेतानि तेरस।
तेरसेते समुट्ठान-नया विञ्ञूहि चिन्तिता॥
तत्थ या तु चतुत्थेन, समुट्ठानेन जायते।
आदिपाराजिकुट्ठाना, अयन्ति परिदीपिता॥
सचित्तकेहि तीहेव, समुट्ठानेहि या पन।
जायते सा पनुद्दिट्ठा, अदिन्नादानपुब्बका॥
समुट्ठानेहि यापत्ति, जातुच्छहिपि जायते।
सञ्चरित्तसमुट्ठाना, नामाति परिदीपिता॥
छट्ठेनेव समुट्ठाति, समुट्ठानेन या पन।
समुट्ठानवसेनायं, वुत्ता समनुभासना॥
ततियच्छट्ठतोयेव, समुट्ठाति हि या पन।
समुट्ठानवसेनायं, कथिनुपपदा मता॥
जायते या पनापत्ति, कायतो कायचित्ततो।
अयमेळकलोमादि-समुट्ठानाति दीपिता॥
जायते या पनापत्ति, वाचतो वाचचित्ततो।
अयं तु पदसोधम्म-समुट्ठानाति वुच्चति॥
कायतो कायवाचम्हा, चतुत्थच्छट्ठतोपि च।
जायते सा पनद्धान-समुट्ठानाति सूचिता॥
चतुत्थच्छट्ठतोयेव, समुट्ठाति हि या पन।
थेय्यसत्थसमुट्ठाना, अयन्ति परिदीपिता॥
पञ्चमेनेव या चेत्थ, समुट्ठानेन जायते।
समुट्ठानवसेनायं, धम्मदेसनसञ्ञिता॥
अचित्तकेहि तीहेव, समुट्ठानेहि या सिया।
समुट्ठानवसेनायं, भूतारोचनपुब्बका॥
पञ्चमच्छट्ठतोयेव, या समुट्ठानतो सिया।
अयं तु पठिता चोरि-वुट्ठापनसमुट्ठिता॥
दुतिया ततियम्हा च, पञ्चमच्छट्ठतोपि या।
जायते अननुञ्ञात-समुट्ठाना अयं सिया॥
पठमं दुतियं तत्थ, चतुत्थं नवमम्पि च।
दसमं द्वादसमञ्चाति, समुट्ठानं सचित्तकं॥
एकेकस्मिं समुट्ठाने, सदिसा इध दिस्सरे।
सुक्कञ्च कायसंसग्गो, पठमानियतोपि च॥
पुब्बुपपरिपाको च, रहो भिक्खुनिया सह।
सभोजने, रहो द्वे च, अङ्गुली, उदके हसं॥
पहारे, उग्गिरे चेव, तेपञ्ञासा च सेखिया।
अधक्खकुब्भजाणुञ्च, गामन्तरमवस्सुता॥
तलमट्ठुदसुद्धि च, वस्संवुट्ठा तथेव च।
ओवादाय न गच्छन्ती, नानुबन्धे पवत्तिनिं॥
पञ्चसत्तति निद्दिट्ठा, कायचित्तसमुट्ठिता।
इमे एकसमुट्ठाना, मेथुनेन समा मता॥
विग्गहं, उत्तरिञ्चेव, दुट्ठुल्लं, अत्तकामता।
दुट्ठदोसा दुवे चेव, दुतियानियतोपि च॥
अच्छिन्दनञ्च परिणामो, मुसा, ओमसपेसुणा।
दुट्ठुल्लारोचनञ्चेव, पथवीखणनम्पि च॥
भूतगामञ्ञवादो च, उज्झापनकमेव च।
निक्कड्ढो, सिञ्चनञ्चेव, तथा आमिसहेतु च॥
भुत्ताविं, एहनादरिं, भिंसापनकमेव च।
अपनिधेय्य, सञ्चिच्च, पाणं, सप्पाणकम्पि च॥
उक्कोटनं =०० तथा ऊनो, संवासो, नासनेन च।
सहधम्मिकं, विलेखाय, मोहनामूलकेन च॥
कुक्कुच्चं, खीयनं दत्वा, परिणामेय्य पुग्गले।
किं ते, अकालं, अच्छिन्दे, दुग्गहा, निरयेन वा॥
गणस्स च विभङ्गञ्च, दुब्बलासा तथेव च।
धम्मिकं कथिनुद्धारं, सञ्चिच्चाफासुमेव च॥
सयं उपस्सयं दत्वा, अक्कोसेय्य च चण्डिका।
कुलमच्छरिनी अस्स, गब्भिनिं वुट्ठपेय्य च॥
पायन्तिं, द्वे च वस्सानि, सङ्घेनासम्मतम्पि च।
तिस्सो गिहिगता वुत्ता, तिस्सोयेव कुमारिका॥
ऊनद्वादसवस्सा द्वे, तथालं ताव तेति च।
सोकावस्सा तथा पारि-वासिकच्छन्ददानतो॥
अनुवस्सं दुवे चाति, सिक्खा एकूनसत्तति।
अदिन्नादानतुल्यत्ता, तिसमुट्ठानिका कता॥
सञ्चरिकुटिमहल्लकं, धोवापनञ्च पटिग्गहो।
चीवरस्स च विञ्ञत्ति, गहणञ्च तदुत्तरिं॥
उपक्खटद्वयञ्चेव, तथा दूतेन चीवरं।
कोसियं, सुद्धकाळानं, द्वेभागादानमेव च॥
छब्बस्सानि, पुराणस्स, लोमधोवापनम्पि च।
रूपियस्स पटिग्गाहो, उभो नानप्पकारका॥
ऊनबन्धनपत्तो च, वस्ससाटिकसुत्तकं।
विकप्पापज्जनं, याव, द्वार, दानञ्च सिब्बनं॥
पूवेहि, पच्चयो जोतिं, रतनं, सूचि, मञ्चकं।
तूलं, निसीदनं, कण्डु, वस्सिका, सुगतस्स च॥
अञ्ञविञ्ञत्तिसिक्खा च, अञ्ञचेतापनम्पि च।
सङ्घिकेन दुवे वुत्ता, द्वे महाजनिकेन च॥
तथा =०१ पुग्गलिकेनेकं, गरुपावुरणं लहुं।
द्वे विघासोदसाटी च, तथा समणचीवरं॥
इति एकूनपण्णास, धम्मा दुक्खन्तदस्सिना।
छसमुट्ठानिका एते, सञ्चरित्तसमा कता॥
सङ्घभेदो च भेदानु-वत्तदुब्बचदूसका।
दुट्ठुल्लच्छादनं, दिट्ठि, छन्द, उज्जग्घिका दुवे॥
अप्पसद्दा दुवे वुत्ता, तथा न ब्याहरेति च।
छमा, नीचासने, ठानं, पच्छतो, उप्पथेन च॥
वज्जच्छादानुवत्ता च, गहणं, ओसारेय्य च।
पच्चक्खामीति सिक्खा च, तथा किस्मिञ्चिदेव च॥
संसट्ठा द्वे, वधित्वा च, विसिब्बेत्वा च दुक्खितं।
पुनदेव च संसट्ठा, नेव वूपसमेय्य च॥
जानं सभिक्खुकारामं, तथेव न पवारये।
तथा अन्वद्धमासञ्च, सहजीविनियो दुवे॥
सचे मे चीवरं अय्ये, अनुबन्धिस्ससीति च।
सत्ततिंस इमे धम्मा, सम्बुद्धेन पकासिता॥
सब्बे एते समुट्ठाना, कायवाचादितो सियुं।
समासमसमेनेव, कता समनुभासना॥
कथिनानि च तीणादि, पत्तो, भेसज्जमेव च।
अच्चेकम्पि च सासङ्कं, पक्कमन्तद्वयम्पि च॥
तथा उपस्सयं गन्त्वा, भोजनञ्च परम्परं।
अनतिरित्तं सभत्तो, विकप्पेत्वा तथेव च॥
रञ्ञो, विकाले, वोसासा-रञ्ञकुस्सयवादिका।
पत्तसन्निचयञ्चेव, पुरे, पच्छा, विकालके॥
पञ्चाहिकं =०२, सङ्कमनिं, तथा आवसथद्वयं।
पसाखे, आसने चाति, एकूनतिंसिमे पन॥
द्विसमुट्ठानिका धम्मा, निद्दिट्ठा कायवाचतो।
कायवाचादितो चेव, सब्बे कथिनसम्भवा॥
द्वे सेय्याहच्चपादो च, पिण्डञ्च गणभोजनं।
विकाले, सन्निधिञ्चेव, दन्तपोनमचेलकं॥
उय्युत्तञ्च वसुय्योधिं, सुरा, ओरेन न्हायनं।
दुब्बण्णकरणञ्चेव, पाटिदेसनियद्वयं॥
लसुणं, उपतिट्ठेय्य, नच्चदस्सनमेव च।
नग्गं, अत्थरणं, मञ्चे, अन्तोरट्ठे, तथा बहि॥
अन्तोवस्समगारञ्च, आसन्दिं, सुत्तकन्तनं।
वेय्यावच्चं, सहत्था च, आवासे च अभिक्खुके॥
छत्तं, यानञ्च सङ्घाणिं, अलङ्कारं, गन्धवासितं।
भिक्खुनी, सिक्खमाना च, सामणेरी, गिहीनिया॥
तथा संकच्चिका चाति, तेचत्तालीसिमे पन।
सब्बे एळकलोमेन, द्विसमुट्ठानिका समा॥
अञ्ञत्रासम्मतो चेव, तथा अत्थङ्गतेन च।
तिरच्छानविज्जा द्वे वुत्ता, अनोकासकतम्पि च॥
सब्बे छ पनिमे धम्मा, वाचतो वाचचित्ततो।
द्विसमुट्ठानिका होन्ति, पदसोधम्मतुल्यता॥
एकं नावं, पणीतञ्च, संविधानञ्च संहरे।
धञ्ञं, निमन्तिता चेव, पाटिदेसनियट्ठकं॥
एता =०३ चतुसमुट्ठाना, सिक्खा चुद्दस होन्ति हि।
पञ्ञत्ता बुद्धसेट्ठेन, अद्धानेन समा मता॥
सुतिं, सूपादिविञ्ञत्तिं, अन्धकारे तथेव च।
पटिच्छन्ने च ओकासे, ब्यूहे चाति इमे छपि॥
सब्बे तु द्विसमुट्ठाना, चतुत्थच्छट्ठतो सियुं।
थेय्यसत्थसमुट्ठाना, देसितादिच्चबन्धुना॥
छत्त, दण्डकरस्सापि, सत्थावुधकरस्सपि।
पादुकूपाहना, यानं, सेय्या, पल्लत्थिकाय च॥
वेठितोगुण्ठितो चाति, एकादस निदस्सिता।
सब्बे एकसमुट्ठाना, धम्मदेसनसञ्ञिता॥
भूतारोचनकञ्चेव , चोरिवुट्ठापनम्पि च।
अननुञ्ञातमत्तञ्हि, असम्भिन्नमिदं तयं॥
पणीतभोजनं वत्वा, होति पाचित्ति भुञ्जतो।
भिक्खुनिं न निवारेत्वा, पाटिदेसनियं सिया॥
सियुं कति चतुत्थेन, समुट्ठानेन मे भण?
छळेवापत्तियो होन्ति, मेथुनं यदि सेवति॥
होति पाराजिकं तस्स, कुटिं संयाचिकाय तु।
करोतो पन तिस्सोव, पयोगे दुक्कटादयो॥
विकाले पन पाचित्ति, तथा अञ्ञातिहत्थतो।
गहेत्वा भुञ्जतो वुत्तं, पाटिदेसनियम्पि च॥
कति आपत्तियो होन्ति, पञ्चमेन? छ होन्ति हि।
मनुस्सुत्तरिधम्मं तु, वदं पाराजिकं फुसे॥
वाचेति पदसो धम्मं, होति पाचित्ति भिक्खुनो।
दवकम्यता वदन्तस्स, तस्स दुब्भासितं सिया॥
समुट्ठानेन =०५ छट्ठेन, कति आपत्तियो सियुं?
छ च संविदहित्वान, भण्डं हरति चे चुतो॥
पणीतभोजनं वत्वा, होति पाचित्ति भुञ्जतो।
भिक्खुनिं न निवारेत्वा, पाटिदेसनियं सिया॥
स च दुत्तरमुत्तरमुत्तरति॥
इतो परं पवक्खामि, परमेकुत्तरं नयं।
अविक्खित्तेन चित्तेन, तं सुणाथ समाहिता॥
के आपत्तिकरा धम्मा, अनापत्तिकरापि के?
का पनापत्तियो नाम, लहुका गरुकापि का?
सावसेसा च कापत्ति, का नामानवसेसका?
दुट्ठुल्ला नाम कापत्ति, अदुट्ठुल्लापि नाम का?
नियता नाम कापत्ति, का पनानियतापि च?
देसनागामिनी का च, का चादेसनगामिनी?
समुट्ठानानि आपत्ति-करा धम्माति दीपिता।
अनापत्तिकरा धम्मा, समथा सत्त दस्सिता॥
पाराजिकादयो सत्त-विधा आपत्तियो सियुं।
लहुका तत्थ पञ्चेव, होन्ति थुल्लच्चयादयो॥
पाराजिकं ठपेत्वान, सावसेसावसेसका।
एका पाराजिकापत्ति, मता अनवसेसका॥
‘‘दुट्ठुल्ला’’ति =०६ च निद्दिट्ठा, दुविधापत्तिआदितो।
सेसा पञ्चविधापत्ति, ‘‘अदुट्ठुल्ला’’ति दीपिता॥
पञ्चानन्तरियसंयुत्ता, नियतानियतेतरा।
देसनागामिनी पञ्च, द्वे पनादेसगामिका॥
अभब्बापत्तिको को च, भब्बापत्तिकपुग्गलो?
उपसम्पदकम्मं तु, सत्थुना कस्स वारितं?
आपत्तिमापज्जितुं द्वेव लोके।
बुद्धा च पच्चेकबुद्धा अभब्बा।
आपत्तिमापज्जितुं द्वेव लोके।
भिक्खू च भब्बा अथ भिक्खुनी च॥
वत्थुविपन्नो दुक्कटकारी।
नो परिपुण्णो याचति यो नो।
अत्थापत्ति हवे लद्ध-समापत्तिस्स भिक्खुनो।
अत्थापत्ति हि नो लद्ध-समापत्तिस्स दीपिता॥
भूतस्सारोचनं लद्ध-समापत्तिस्स निद्दिसे।
अभूतारोचनापत्ति, असमापत्तिलाभिनो॥
अत्थि सद्धम्मसंयुत्ता, असद्धम्मयुतापि च।
सपरिक्खारसंयुत्ता, परसन्तकसंयुता॥
पदसोधम्ममूलादी, सद्धम्मपटिसंयुता।
दुट्ठुल्लवाचसंयुत्ता, असद्धम्मयुता सिया॥
अतिरेकदसाहं तु, ठपने चीवरादिनो।
अनिस्सज्जित्वा भोगे च, सपरिक्खारसंयुता॥
सङ्घस्स मञ्चपीठादिं, अज्झोकासत्थरेपि च।
अनापुच्छाव गमने, परसन्तकसंयुता॥
कथञ्हि =०७ भणतो सच्चं, गरुकं होति भिक्खुनो?
कथं मुसा भणन्तस्स, लहुकापत्ति जायते?
‘‘सिखरणी’’ति सच्चं तु, भणतो गरुकं सिया।
सम्पजानमुसावादे, पाचित्ति लहुका भवे॥
कथं मुसा भणन्तस्स, गरुकं होति भिक्खुनो?
कथञ्च भणतो सच्चं, आपत्ति लहुका सिया?
अभूतारोचने तस्स, गरुकापत्ति दीपिता।
भूतस्सारोचने सच्चं, वदतो लहुका सिया॥
कथं भूमिगतो दोसं, न वेहासगतो फुसे?
कथं वेहासगो दोसं, न च भूमिगतो फुसे?
सङ्घकम्मं विकोपेतुं, हत्थपासं जहं फुसे।
केसमत्तम्पि आकासे, तिट्ठतो नत्थि वज्जता॥
आहच्चपादकं मञ्चं, वेहासकुटियूपरि।
पीठं वाभिनिसीदन्तो, आपज्जति न भूमितो॥
पविसन्तो कथं भिक्खु, आपज्जति, न निक्खमं?
पविसन्तो कथं भिक्खु, पविसन्तो न चेव तं?
सछत्तुपाहनो वत्त-मपूरेत्वान केवलं।
पविसन्तो पनापत्तिं, आपज्जति, न निक्खमं॥
गमिको गमिकवत्तानि, अपूरेत्वान निक्खमं।
निक्खमन्तोव आपत्तिं, फुसेय्य, पविसं न च॥
आदियन्तो पनापत्तिं, आपज्जति कथं वद?
तथेवानादियन्तोपि, आपज्जति कथं वद?
भिक्खुनी अतिगम्भीरं, या काचुदकसुद्धिकं।
आदियन्ती पनापत्तिं, आपज्जति, न संसयो॥
अनादियित्वा दुब्बण्ण-करणं पन चीवरं।
येवं अनादियन्तोव, आपज्जति हि नाम सो॥
समादियन्तो आपत्तिं, आपज्जति कथं पन?
तथासमादियन्तोपि, आपज्जति कथं पन?
यो =०८ हि मूगब्बतादीनि, वतानिध समादियं।
समादियन्तो आपत्तिं, आपज्जति हि नाम सो॥
यो हि कम्मकतो भिक्खु, वुत्तं वत्तं पनत्तनो।
तञ्चासमादियन्तोव, आपज्जति हि नाम सो॥
करोन्तोव पनापत्तिं, कथमापज्जते नरो?
न करोन्तो कथं नाम, समणो दोसवा सिया?
भण्डागारिककम्मञ्च, वेज्जकम्मञ्च चीवरं।
अञ्ञातिकाय सिब्बन्तो, करं आपज्जते नरो॥
उपज्झायस्स वत्तानि, वत्तानि इतरस्स वा।
अकरोन्तो पनापत्तिं, आपज्जति हि नाम सो॥
देन्तो आपज्जतापत्तिं, न देन्तोपि कथं भण?
अञ्ञातिकाय यं किञ्चि, भिक्खु भिक्खुनिया पन॥
चीवरं ददमानो हि, देन्तो आपज्जते पन।
तथन्तेवासिकादीनं, अदेन्तो चीवरादिकं॥
अत्तसन्निस्सिता अत्थि, तथेव परनिस्सिता।
मुदुलम्बादिनो अत्ता, सेसा हि परनिस्सिता॥
कथञ्च पटिगण्हन्तो, आपज्जति हि वज्जतं?
कथमप्पटिगण्हन्तो, आपज्जति हि वज्जतं?
चीवरं पटिगण्हन्तो, भिक्खु अञ्ञातिहत्थतो।
ओवादञ्च न गण्हन्तो, आपज्जति हि वज्जतं॥
कथञ्च परिभोगेन, आपज्जति तपोधनो?
कथं न परिभोगेन, आपज्जति तपोधनो?
यो हि निस्सग्गियं वत्थुं, अच्चजित्वा निसेवति।
अयं तु परिभोगेन, आपज्जति, न संसयो॥
अतिक्कमेन्ती सङ्घाटि-चारं पञ्चाहिकं पन।
अयं तु परिभोगेन, आपज्जति हि भिक्खुनी॥
दिवापज्जति नो रत्तिं, रत्तिमेव च नो दिवा।
द्वारं असंवरित्वान, सेन्तो आपज्जते दिवा॥
सगारसेय्यकं =०९ रत्तिं, आपज्जति हि नो दिवा।
अरुणुग्गे पनापत्ति, कथं न अरुणुग्गमे?
एकछारत्तसत्ताह-दसाहादिअतिक्कमे।
फुसन्तो वुत्तमापत्तिं, आपज्जत्यरुणुग्गमे॥
पवारेत्वान भुञ्जन्तो, फुसे न अरुणुग्गमे।
छिन्दन्तस्स सियापत्ति, कथमच्छिन्दतो सिया?
छिन्दन्तो भूतगामञ्च, अङ्गजातञ्च अत्तनो।
पाराजिकञ्च पाचित्तिं, फुसे थुल्लच्चयम्पि च॥
न छिन्दन्तो नखे केसे, आपज्जति हि नाम सो।
छादेन्तोपज्जतापत्तिं, नच्छादेन्तो कथं पन?
छादेन्तो पन आपत्तिं, छादेन्तोपज्जते नरो।
आपज्जति पनच्छिन्नो, नच्छादेन्तो तिणादिना॥
आपज्जति हि धारेन्तो, न धारेन्तो कथं पन?
धारेन्तो कुसचीरादिं, धारेन्तोपज्जते पन॥
दिन्नं निस्सट्ठपत्तं तं, अधारेन्तोव दोसवा।
सचित्तकदुकं सञ्ञा-विमोक्खकदुकं भवे॥
अत्थापत्ति हि तिट्ठन्ते, नाथे, नो परिनिब्बुते।
निब्बुते न तु तिट्ठन्ते, अत्थापत्तुभयत्थपि॥
रुहिरुप्पादनापत्ति, ठिते, नो परिनिब्बुते।
थेरमावुसवादेन, वदतो परिनिब्बुते॥
आपत्तियो इमा द्वेपि, ठपेत्वा सुगते पन।
अवसेसा धरन्तेपि, भवन्ति परिनिब्बुते॥
कालेयेव सियापत्ति, विकाले न सिया कथं?
विकाले तु सियापत्ति, न काले, उभयत्थपि?
भुञ्जतोनतिरित्तं तु, कालस्मिं, नो विकालके।
विकालभोजनापत्ति, विकाले, तु न कालके॥
अवसेसं =१० पनापत्तिं, आपज्जति हि सब्बदा।
सब्बं काले विकाले च, नत्थि तत्थ च संसयो॥
रत्तिमेव पनापत्तिं, आपज्जति च नो दिवा।
दिवापज्जति नो रत्तिं, आपज्जतुभयत्थपि॥
सहसेय्या सिया रत्तिं, द्वारासंवरमूलका।
दिवा, सेसा पनापत्ति, सिया रत्तिं दिवापि च॥
दसवस्सो तु नो ऊन-दसवस्सो सिया कथं?
होतूनदसवस्सो, नो, दसवस्सूभयत्थपि?
उपट्ठापेति चे बालो, परिसं दसवस्सिको।
आपत्तिं पन अब्यत्तो, आपज्जति, न संसयो॥
तथूनदसवस्सो च, ‘‘पण्डितोह’’न्ति गण्हति।
परिसं, दसवस्सो नो, सेसमापज्जते उभो॥
काळे आपज्जतापत्तिं, न जुण्हे जुण्हके कथं।
आपज्जति, न काळस्मिं, आपज्जतूभयत्थपि?
वस्सं अनुपगच्छन्तो, काळे, नो जुण्हके पन।
आपज्जतापवारेन्तो, जुण्हे, न पन काळके॥
अवसेसं तु पञ्ञत्त-मापत्तिमविपत्तिना।
काळे चेव च जुण्हे च, आपज्जति, न संसयो॥
वस्सूपगमनं काळे, नो जुण्हे, तु पवारणा।
जुण्हे कप्पति, नो काळे, सेसं पनुभयत्थपि॥
अत्थापत्ति तु हेमन्ते, न होतीतरुतुद्वये।
गिम्हेयेव न सेसेसु, वस्से नो इतरद्वये॥
दिने पाळिपदक्खाते, कत्तिके पुण्णमासिया।
ठपितं तु विकप्पेत्वा, वस्ससाटिकचीवरं॥
आपज्जति च हेमन्ते, निवासेति च तं सचे।
पुण्णमादिवसस्मिञ्हि, कत्तिकस्स तु पच्छिमे॥
तं अपच्चुद्धरित्वाव, हेमन्तेयेव, नेतरे।
आपज्जतीति निद्दिट्ठं, कुरुन्दट्ठकथाय तु॥
‘‘अतिरेकमासो =११ सेसो’’ति।
विज्जमाने सचे नग्गो, वस्ससाटिकचीवरे।
ओवस्सापेति यो कायं, वस्से आपज्जतीध सो॥
आपज्जति हि सङ्घोव, न गणो न च पुग्गलो।
गणोव न च सेसा हि, पुग्गलोव न चापरे॥
अधिट्ठानं करोन्तो वा, पारिसुद्धिउपोसथं।
सङ्घो वापज्जतापत्तिं, न गणो न च पुग्गलो॥
सुत्तुद्देसमधिट्ठानं, करोन्तो वा उपोसथं।
गणो वापज्जतापत्तिं, न सङ्घो न च पुग्गलो॥
सुत्तुद्देसं करोन्तो वा, एको पन उपोसथं।
पुग्गलोपज्जतापत्तिं, न च सङ्घो गणो न च॥
आपज्जति गिलानोव, नागिलानो कथं पन।
आपज्जतागिलानोव, नो गिलानो उभोपि च?
भेसज्जेन पनञ्ञेन, अत्थे सति च यो पन।
विञ्ञापेति तदञ्ञं सो, आपज्जति अकल्लको॥
न भेसज्जेन अत्थेपि, भेसज्जं विञ्ञापेति चे।
आपज्जतागिलानोव, सेसं पन उभोपि च॥
अत्थापत्ति हि अन्तोव, न बहिद्धा, तथा बहि।
आपज्जति, न चेवन्तो, अत्थापत्तुभयत्थपि॥
अनुपखज्ज सेय्यं तु, कप्पेन्तो पन केवलं।
आपज्जति पनापत्तिं, अन्तोयेव च, नो बहि॥
अज्झोकासे तु मञ्चादिं, सन्थरित्वान पक्कमं।
बहियेव च, नो अन्तो, सेसं पनुभयत्थपि॥
अन्तोसीमायेवापत्तिं, बहिसीमाय नेव च।
बहिसीमाय, नो अन्तो-सीमाय, उभयत्थपि॥
सछत्तुपाहनो =१२ भिक्खु, पविसन्तो तपोधनो।
उपचारसीमोक्कन्ते, अन्तो आपज्जते पन॥
गमिको दारुभण्डादिं, पटिसामनवत्तकं।
अपूरेत्वान गच्छन्तो, उपचारस्सतिक्कमे॥
आपज्जति पनापत्तिं, बहिसीमाययेव सो।
सेसमापज्जते अन्तो-बहिसीमाय सब्बसो॥
सकवाचाय आपन्नो, परवाचाय सुज्झति।
परवाचाय आपन्नो, सकवाचाय सुज्झति॥
सकवाचाय आपन्नो, सकवाचाय सुज्झति।
परवाचाय आपन्नो, परवाचाय सुज्झति॥
वचीद्वारिकमापत्तिं , आपन्नो सकवाचतो।
तिणवत्थारकं गन्त्वा, परवाचाय सुज्झति॥
तथा अप्पटिनिस्सग्गे, पापिकाय हि दिट्ठिया।
परस्स कम्मवाचाय, आपज्जित्वान वज्जतं॥
देसेन्तो भिक्खुनो मूले, सकवाचाय सुज्झति।
वचीद्वारिकमापत्तिं, आपन्नो भिक्खुसन्तिके॥
देसेत्वा तं विसुज्झन्तो, सकवाचाय सुज्झति।
सङ्घादिसेसमापत्तिं, यावततियकं पन॥
परस्स कम्मवाचाय, आपज्जित्वा तथा पुन।
परस्स परिवासादि-कम्मवाचाय सुज्झति॥
कायेनापज्जतापत्तिं, वाचाय च विसुज्झति।
वाचायापज्जतापत्तिं, कायेन च विसुज्झति॥
कायेनापज्जतापत्तिं, कायेनेव विसुज्झति।
वाचायापज्जतापत्तिं, वाचायेव विसुज्झति॥
कायद्वारिकमापत्तिं, कायेनापज्जते, पुन।
देसेन्तो तं पनापत्तिं, वाचायेव विसुज्झति॥
वचीद्वारिकमापत्तिं =१३, आपज्जित्वान वाचतो।
तिणवत्थारकं गन्त्वा, कायेनेव विसुज्झति॥
कायद्वारिकमापत्तिं, आपज्जित्वान कायतो।
तिणवत्थारकं गन्त्वा, कायेनेव विसुज्झति॥
वचीद्वारिकमापत्तिं, आपज्जित्वा तपोधनो।
तमेव पन देसेन्तो, वाचायेव विसुज्झति॥
सुत्तो आपज्जतापत्तिं, पटिबुद्धो विसुज्झति।
आपन्नो पटिबुद्धोव, सुत्तो सुज्झति सो कथं?
सुत्तो आपज्जतापत्तिं, सुत्तोयेव विसुज्झति।
पटिबुद्धोव आपन्नो, पटिबुद्धो विसुज्झति?
सगारसेय्यकादिं तु, सुत्तो आपज्जते नरो।
देसेन्तो पन तं ञत्वा, पटिबुद्धो विसुज्झति॥
आपज्जित्वान जग्गन्तो, तिणवत्थारके पन।
समथे तु सयन्तोव, सुत्तो वुट्ठाति नाम सो॥
सगारसेय्यकादिं तु, सुत्तो आपज्जते नरो।
सयन्तो तिणवत्थारे, सुत्तोयेव विसुज्झति॥
आपज्जित्वा पनापत्तिं, जग्गन्तो पन केवलं।
देसेन्तो पन तं पच्छा, पटिबुद्धो विसुज्झति॥
आपज्जित्वा अचित्तोव, सचित्तोव विसुज्झति।
आपज्जित्वा सचित्तोव, अचित्तोव विसुज्झति॥
आपज्जित्वा अचित्तोव, अचित्तोव विसुज्झति।
आपज्जित्वा सचित्तोव, सचित्तोव विसुज्झति॥
अचित्तो, चित्तकापत्तिं, आपज्जित्वा तपोधनो।
पच्छा तं पन देसेन्तो, सचित्तोव विसुज्झति॥
तथा सचित्तकापत्तिं, आपज्जित्वा सचित्तको।
सयन्तो तिणवत्थारे, अचित्तोव विसुज्झति॥
एवमेवं अमिस्सेत्वा, पच्छिमं तु पदद्वयं।
एत्थ वुत्तानुसारेन, वेदितब्बं विभाविना॥
आपज्जति =१४ च कम्मेन, अकम्मेन विसुज्झति।
आपज्जति अकम्मेन, कम्मेनेव विसुज्झति॥
कम्मेनापज्जतापत्तिं, कम्मेनेव विसुज्झति।
आपज्जति अकम्मेन, अकम्मेन विसुज्झति॥
अच्चजं पापिकं दिट्ठिं, आपज्जित्वान कम्मतो।
देसेन्तो पन तं पच्छा, अकम्मेन विसुज्झति॥
विसट्ठिआदिकापत्तिं , आपज्जित्वा अकम्मतो।
परिसुज्झति कम्मेन, परिवासादिना पन॥
समनुभासनं भिक्खु, आपज्जति च कम्मतो।
परिवासादिना पच्छा, कम्मेनेव विसुज्झति॥
अवसेसं पनापत्तिं, आपज्जति अकम्मतो।
देसेन्तो पन तं पच्छा, अकम्मेनेव सुज्झति॥
सम्मुखापत्तिमापन्नो, विसुज्झति असम्मुखा।
असम्मुखापि आपन्नो, सम्मुखाव विसुज्झति॥
सम्मुखापत्तिमापन्नो, सम्मुखाव विसुज्झति।
असम्मुखाव आपन्नो, विसुज्झति असम्मुखा॥
अच्चजं पापकं दिट्ठिं, आपन्नो सङ्घसम्मुखे।
वुट्ठानकाले सङ्घेन, किञ्चि कम्मं न विज्जति॥
विसट्ठिआदिकापत्तिं, आपज्जित्वा असम्मुखा।
सङ्घसम्मुखतोयेव, विसुज्झति न चञ्ञथा॥
समनुभासनं सङ्घ-सम्मुखापज्जते, पुन।
सङ्घस्स सम्मुखायेव, विसुज्झति, न चञ्ञथा॥
मुसावादादिकं सेसं, आपज्जति असम्मुखा।
तं पच्छा पन देसेन्तो, विसुज्झति असम्मुखा॥
अजानन्तोव आपन्नो, जानन्तोव विसुज्झति।
जानन्तो पन आपन्नो, अजानन्तो विसुज्झति॥
अजानन्तोव आपन्नो, अजानन्तो विसुज्झति।
जानन्तो पन आपन्नो, जानन्तोव विसुज्झति॥
अचित्तकचतुक्केन =१५, सदिसं सब्बथा इदं।
अजानन्तचतुक्कन्ति, वेदितब्बं विभाविना॥
आगन्तुकोव आपत्तिं, आपज्जति, न चेतरो।
आवासिकोव आपत्तिं, आपज्जति, न चेतरो॥
आगन्तुको तथावासि-कोपि आपज्जरे उभो।
अत्थापत्ति च सेसं तु, उभो नापज्जरे पन॥
सछत्तुपाहनो चेव, ससीसं पारुतोपि च।
विहारं पविसन्तो च, विचरन्तोपि तत्थ च॥
आगन्तुकोव आपत्तिं, आपज्जति, न चेतरो।
आवासवत्तमावासी, अकरोन्तोव दोसवा॥
न चेवागन्तुको, सेस-मापज्जन्ति उभोपि च।
असाधारणमापत्तिं, नापज्जन्ति उभोपि च॥
वत्थुनानत्तता अत्थि, नत्थि आपत्तिनानता।
अत्थि आपत्तिनानत्तं, नत्थि वत्थुस्स नानता॥
वत्थुनानत्तता चेव, अत्थि आपत्तिनानता।
नेवत्थि वत्थुनानत्तं, नो च आपत्तिनानता॥
पाराजिकचतुक्कस्स, वत्थुनानत्तता मता।
आपत्तिनानता नत्थि, सेसापत्तीस्वयं नयो॥
समणो समणी काय-संसग्गं तु करोन्ति चे।
सङ्घादिसेसो भिक्खुस्स, भिक्खुनिया पराजयो॥
एवं आपत्तिनानत्तं, नत्थि वत्थुस्स नानता।
कायस्स पन संसग्गो, उभिन्नं वत्थु होति हि॥
तथेव लसुणस्सापि, खादने भिक्खुनी पन।
आपज्जति हि पाचित्तिं, भिक्खुनो होति दुक्कटं॥
पाराजिकानं पन चे चतुन्नं।
होतेव वत्थुस्स च नानभावो।
पाराजिकानि =१६ चत्तारि, आपज्जन्तानमेकतो।
भिक्खुनीसमणानं तु, उभिन्नं पन सब्बसो॥
वत्थुस्स नत्थि नानत्तं, नत्थि आपत्तिनानता।
विसुं पनापज्जन्तेसु, अयमेव विनिच्छयो॥
अत्थि वत्थुसभागत्तं, नत्थापत्तिसभागता।
अत्थापत्तिसभागता, नत्थि वत्थुसभागता॥
अत्थि वत्थुसभागत्तं, अत्थापत्तिसभागता।
नत्थि वत्थुसभागत्तं, नत्थापत्तिसभागता॥
भिक्खूनं भिक्खुनीनञ्च, कायसंसग्गके सति।
अत्थि वत्थुसभागत्तं, नत्थापत्तिसभागता॥
आदितो पन भिक्खुस्स, चतूस्वन्तिमवत्थुसु।
सियापत्तिसभागत्तं, न च वत्थुसभागता॥
भिक्खूनं भिक्खुनीनञ्च, चतूस्वन्ति मवत्थुसु।
अत्थि वत्थुसभागत्तं, अत्थापत्तिसभागता॥
साधारणासु सब्बासु, आपत्तीस्वप्ययं नयो।
असाधारणासु नेवत्थि, वत्थापत्तिसभागता॥
अत्थापत्ति उपज्झाये, नेव सद्धिविहारिके।
अत्थि सद्धिविहारस्मिं, उपज्झाये न विज्जति॥
अत्थापत्ति उपज्झाये, तथा सद्धिविहारिके।
नेवापत्ति उपज्झाये, नेव सद्धिविहारिके॥
उपज्झायेन कत्तब्ब-वत्तस्साकरणे पन।
उपज्झायो फुसे वज्जं, न च सद्धिविहारिको॥
उपज्झायस्स कत्तब्ब-वत्तस्साकरणे पन।
नत्थापत्ति उपज्झाये, अत्थि सद्धिविहारिके॥
सेसं पनिध आपत्तिं, आपज्जन्ति उभोपि च।
असाधारणमापत्तिं, नापज्जन्ति उभोपि च॥
आदियन्तो गरुं दोसं, पयोजेन्तो लहुं फुसे।
आदियन्तो लहुं दोसं, पयोजेन्तो गरुं फुसे॥
आदियन्तो =१७ पयोजेन्तो, गरुकेयेव तिट्ठति।
आदियन्तो पयोजेन्तो, लहुकेयेव तिट्ठति॥
पादं वापि ततो उद्धं, आदियन्तो गरुं फुसे।
‘‘गण्हा’’ति ऊनकं पादं, आणापेन्तो लहुं फुसे॥
एतेनेव उपायेन, सेसकम्पि पदत्तयं।
अत्थसम्भवतोयेव, वेदितब्बं विभाविना॥
कालेयेव पनापत्ति, नो विकाले कथं सिया?
विकालेयेव आपत्ति, न च काले कथं सिया?
अत्थापत्ति हि काले च, विकाले च पकासिता?
नेव काले विकाले च, अत्थापत्ति पकासिता?
पवारेत्वान भुञ्जन्तो, काले अनतिरित्तकं।
काले आपज्जतापत्तिं, न विकालेति दीपये॥
विकालभोजनापत्तिं, विकाले न च कालके।
सेसं काले विकाले च, आपज्जति, न संसयो॥
असाधारणमापत्तिं, भिक्खुनीनं वसा पन।
नेवापज्जति कालेपि, नो विकालेपि सब्बदा॥
किं पटिग्गहितं काले, नो विकाले तु कप्पति?
विकाले किञ्च नो काले, गहितं पन कप्पति?
काले चेव विकाले च, किं नाम वद कप्पति?
नेव काले च किं नाम, नो विकाले च कप्पति?
आमिसं तु पुरेभत्तं, पटिग्गहितकं पन।
कालेयेव तु भिक्खूनं, नो विकाले तु कप्पति॥
पानकं तु विकालस्मिं, पटिग्गहितकं पन।
विकालेयेव काले च, अपरज्जु न कप्पति॥
सत्ताहकालिकञ्चेव , चतुत्थं यावजीविकं।
काले चेव विकाले च, कप्पतीति विनिद्दिसे॥
अत्तनो अत्तनो काल-मतीतं कालिकत्तयं।
मंसं अकप्पियञ्चेव, तथा उग्गहितम्पि च॥
कुलदूसनकम्मादिं =१८, कत्वा उप्पन्नभोजनं।
काले चेव विकाले च, न च कप्पति भिक्खुनो॥
पच्चन्तिमेसु देसेसु, आपज्जति न मज्झिमे।
मज्झिमे पन देसस्मिं, न च पच्चन्तिमेसु हि॥
पच्चन्तिमेसु देसेसु, आपज्जति च मज्झिमे।
पच्चन्तिमेसु देसेसु, नापज्जति न मज्झिमे॥
सीमं समुद्दे बन्धन्तो, भिक्खु पच्चन्तिमेसु हि।
आपज्जति पनापत्तिं, न चापज्जति मज्झिमे॥
गणेन पञ्चवग्गेन, करोन्तो उपसम्पदं।
चम्मत्थरणं धुवन्हानं, सगुणङ्गुणुपाहनं॥
धारेन्तो मज्झिमे वज्जं, फुसे पच्चन्तिमेसु नो।
अवसेसं पनापत्तिं, आपज्जतूभयत्थपि॥
असाधारणआपत्तिं, भिक्खुनीनं वसा पन।
पच्चन्तिमेसु वा भिक्खु, नापज्जति न मज्झिमे॥
पच्चन्तिमेसु देसेसु, कप्पते न च मज्झिमे।
कप्पते, मज्झिमे देसे, नो च पच्चन्तिमेसु हि॥
पच्चन्तिमेसु देसेसु, कप्पते, मज्झिमेपि किं?
पच्चन्तिमेसु चेवापि, किं न कप्पति मज्झिमे?
पच्चन्तिमेसु देसेसु, वुत्तं वत्थु चतुब्बिधं।
निद्दिसे कप्पती चेव, न च कप्पति मज्झिमे॥
‘‘इदं चतुब्बिधं वत्थु, देसस्मिं पन मज्झिमे।
न कप्पती’’ति वुत्तञ्हि, ‘‘मज्झिमेयेव कप्पति’’॥
पच्चन्तिमेसु देसेसु, एवं वुत्तं न कप्पति।
पञ्चलोणादिकं सेसं, उभयत्थपि कप्पति॥
अकप्पियन्ति यं नाम, पटिक्खित्तं महेसिना।
उभयत्थपि तं सब्बं, न च कप्पति भिक्खुनो॥
अन्तो आपज्जतापत्तिं, आपज्जति च, नो बहि।
बहि आपज्जतापत्तिं, न च अन्तो कुदाचनं॥
आपज्जति =१९ पनन्तो च, बहि चेवुभयत्थपि।
नेव अन्तो च आपत्तिं, आपज्जति च, नो बहि॥
अनुपखज्जसेय्यादिं, अन्तोयेव च, नो बहि।
सङ्घिकं पन मञ्चादिं, अज्झोकासे तु किञ्चिपि॥
निक्खिपित्वान गच्छन्तो, नो अन्तो, बहियेव च।
सेसमापज्जतापत्तिं, अन्तो चेव तथा बहि॥
असाधारणमापत्तिं, भिक्खुनीनं वसा पन।
नेवापज्जति अन्तोपि, न बहिद्धापि सब्बथा॥
गामे आपज्जतापत्तिं, नो अरञ्ञे कथं वद?
आपज्जति अरञ्ञस्मिं, न च गामे कथं वद?
आपज्जति च गामेपि, अरञ्ञेपि कथं वद?
नेवापज्जति गामेपि, नो अरञ्ञे कथं वद?
अन्तरघरसंयुत्ता, सेक्खपञ्ञत्तियो पन।
आपज्जति हि तं भिक्खु, गामस्मिं, नो अरञ्ञके॥
अगणा अरुणं नाम, उट्ठापेन्ती च भिक्खुनी।
आपज्जति पनापत्तिं, अरञ्ञे, नो च गामके॥
मुसावादादिमापत्तिं , आपज्जतूभयत्थपि।
असाधारणमापत्तिं, आपज्जति न कत्थचि॥
आपज्जति गिलानोव, नागिलानो कुदाचनं।
अगिलानोव आपत्तिं, फुसे, नो च गिलानको॥
अगिलानो गिलानो च, आपज्जन्ति उभोपि च।
नापज्जन्ति गिलानो च, अगिलानो उभोपि च॥
भेसज्जेन पनञ्ञेन, अत्थे सति च यो पन।
विञ्ञापेति तदञ्ञं सो, आपज्जति अकल्लको॥
न भेसज्जेन अत्थेपि, भेसज्जं विञ्ञापेति चे।
आपज्जतागिलानोव, आपत्तिं लोलमानसो॥
मुसावादादिकं सेसं, आपज्जन्ति उभोपि च।
असाधारणमापत्तिं, नापज्जन्ति उभोपि च॥
पञ्च =२० आपत्तियो होन्ति, मुसावादस्स कारणा।
पाराजिकं गरुंथुल्ल-च्चयं पाचित्ति दुक्कटं॥
आनिसंसा पनुद्दिट्ठा, पञ्चेव कथिनत्थरे।
अनामन्तासमादान-चरणं गणभोजनं॥
यो तत्थ चीवरुप्पादो, सो च नेसं भविस्सति।
चीवरं यावदत्थञ्च, गहेतुम्पि च वट्टति॥
तेलं पञ्चविधं वुत्तं, निप्पपञ्चेन सत्थुना।
वसा मधुकएरण्ड-तिलसासपसम्भवं॥
अच्छमच्छवसा चेव, सुसुका सूकरस्स च।
गद्रभस्स वसा चेति, वसा पञ्चविधा मता॥
मूलखन्धग्गबीजानि , फळुबीजञ्च पण्डितो।
पञ्चमं बीजबीजन्ति, पञ्च बीजानि दीपये॥
फलं समणकप्पेहि, परिभुञ्जेय्य पञ्चहि।
अग्गिसत्थनखक्कन्तं, अबीजुब्बट्टबीजकं॥
पण्णुण्णतिणचोळानं, वाकस्स च वसेनिध।
भिसियो भासिता पञ्च, मुनिना मोहनासिना॥
पवारणापि पञ्चेव, ओदनादीहि पञ्चहि।
पटिग्गाहापि पञ्चेव, कायादिगहणेन च॥
पञ्चानिसंसा विनयञ्ञुकस्मिं।
महेसिना कारुणिकेन वुत्ता।
सुरक्खितं होति सकञ्च सीलं।
कुक्कुच्चमञ्ञस्स निराकरोति॥
सुखेन निग्गण्हति वेरिभिक्खू।
धम्मस्स चेव ठितिया पवत्तो।
तस्मादरं तत्थ करेय्य धीरो॥
छवच्छेदनका =२१ वुत्ता, छळभिञ्ञेन तादिना।
मञ्चपीठमतिक्कन्त-पमाणञ्च निसीदनं॥
तथा कण्डुपटिच्छादी, वस्ससाटिकचीवरं।
चीवरं सुगतस्सापि, चीवरेन पमाणकं॥
छहाकारेहि आपत्तिं, आपज्जति न अञ्ञथा।
अलज्जिताय अञ्ञाण-कुक्कुच्चेहि तथेव च॥
विपरिताय सञ्ञाय, कप्पियेपि अकप्पिये।
सतिसम्मोसतो चेव, आपज्जति, न संसयो॥
भिक्खुनापट्ठपेतब्बो, सततं धम्मचक्खुना।
आपत्तिं पन जानाति, अनापत्तिं गरुं लहुं॥
पातिमोक्खानि वित्थारा, उभयानि पनस्स हि।
स्वागतानि भवन्तेव, सुविभत्तानि अत्थतो॥
अनुब्यञ्जनसो चेव, सुत्तसो सुविनिच्छिता।
दसवस्सोपि वा होतितिरेकदसवस्सिको॥
सत्त सामीचियो वुत्ता, सत्तेव समथापि च।
पञ्ञत्तापत्तियो सत्त, सत्तबोज्झङ्गदस्सिना॥
कुलानि इध दूसेति, आकारेहि पनट्ठहि।
पुप्फेन च फलेनापि, चुण्णेनपि च दूसको॥
मत्तिकादन्तकट्ठेहि, वेळुया वेज्जिकायपि।
जङ्घपेसनिकेनापि, आजीवस्सेव कारणा॥
अट्ठेवानतिरित्तापि , अतिरित्तापि अट्ठ च।
अकप्पियकतं चेवागहितुच्चारितम्पि च॥
कतं अहत्थपासेपि, न च भुत्ताविना कतं।
पवारितेन यञ्चेव, कतं भुत्ताविनापि च॥
आसना वुट्ठितेनापि, अतिरित्तकतम्पि च।
अवुत्तमलमेतन्ति, न गिलानातिरित्तकं॥
इमे अट्ठेव निद्दिट्ठा, ञेय्या अनतिरित्तका।
अतिरित्ता पनेतेसं, पटिक्खेपेन दीपिता॥
सहपुब्बपयोगेसु, दुक्कटं ञातञत्तिसु।
दुरूपचिण्णे आमासे, दुक्कटं पटिसावने॥
अट्ठमं पन निद्दिट्ठं, तथा विनयदुक्कटं।
इति अट्ठविधं होति, सब्बमेव च दुक्कटं॥
एहिभिक्खूपसम्पदा, सरणगमनेन च।
पञ्हाब्याकरणोवादा, गरुधम्मपटिग्गहो॥
तथा ञत्तिचतुत्थेन, कम्मेनेवट्ठवाचिका।
दूतेन भिक्खुनीनन्ति, अट्ठेव उपसम्पदा॥
असद्धम्मा पनट्ठेव, निद्दिट्ठा सुद्धदिट्ठिना।
अट्ठेवुपोसथङ्गानि, वेदितब्बानि विञ्ञुना॥
पाणं न हने, न चादिन्नमादिये।
मुसा न भासे, न च मज्जपो सिया।
अब्रह्मचरिया विरमेय्य मेथुना।
रत्तिं न भुञ्जेय्य विकालभोजनं॥
मालं न धारे, न च गन्धमाचरे।
मञ्चे छमायंव सयेथ सन्थते।
एतञ्हि अट्ठङ्गिकमाहुपोसथं।
बुद्धेन दुक्खन्तगुना पकासितं॥
अट्ठेव पन पानानि, निद्दिट्ठानि महेसिना।
भिक्खु अट्ठङ्गसंयुत्तो, भिक्खुनोवादमरहति॥
भोजनानि पणीतानि, नव वुत्तानि सत्थुना।
दुक्कटं पन निद्दिट्ठं, नव मंसानि खादतो॥
पातिमोक्खस्स उद्देसा, नवेव परिदीपिता।
उपोसथा नवेवेत्थ, सङ्घो नवहि भिज्जति॥
दस अक्कोसवत्थूनि, दस सिक्खापदानि च।
अकप्पियानि मंसानि, दस सुक्कानि वे दस॥
जाति नामञ्च गोत्तञ्च, कम्मं सिप्पञ्च रोगता।
लिङ्गापत्ति किलेसा च, अक्कोसेन दसेव हि॥
दस आदीनवा रञ्ञो, अन्तेपुरप्पवेसने।
दसाकारेहि सङ्घादि-सेसो छन्नोति दीपितो॥
दस कम्मपथा पुञ्ञा, अपुञ्ञापि तथा दस।
दसेव दानवत्थूनि, दसेव रतनानि च॥
अन्नं पानञ्च वत्थञ्च, माला गन्धविलेपनं।
यानञ्च सेय्यावसथं, पदीपेय्यन्तिमे दस॥
अवन्दिया मुनिन्देन, दीपिता दस पुग्गला।
दसेव पंसुकूलानि, दस चीवरधारणा॥
सोसानिकं पापणिकं, तथा उन्दूरखायितं।
गोखायितग्गिना दड्ढं, अजिकूपचिकखायितं॥
थूपचीवरिकञ्चेव, तथेव अभिसेकियं।
गतपच्छागतञ्चेति, दसधा पंसुकूलिकं॥
सब्बनीलादयो वुत्ता, दस चीवरधारणा।
चीवरानि नवेवेत्थ, सद्धिं संकच्चिकाय च॥
एकादस पनाभब्बा, पुग्गला पण्डकादयो।
होन्तेवानुपसम्पन्ना, उपसम्पादितापि च॥
पत्ता अकप्पिया वुत्ता, एकादस भवन्ति हि।
दारुजेन च पत्तेन, दसेव रतनुब्भवा॥
एकादस तथा होन्ति, पादुकापि अकप्पिया।
एकादसेव सीमायो, असीमाति पकासिता॥
अतिखुद्दातिमहन्ता, खण्डच्छायानिमित्तका।
अनिमित्ता, बहिट्ठेन, सम्मता, नदियं तथा॥
जातस्सरे, समुद्दे वा, सम्भिन्नज्झोत्थटापि च।
सीमायपि असीमायो, एकादस इमा सियुं॥
एकादसेव पथवी, कप्पिया च अकप्पिया।
गण्ठिका कप्पिया वुत्ता, एकादस च वीधका॥
एकादसविधं वुत्तं, अधिट्ठातब्बचीवरं।
तिचीवरं तथा कण्डु-पटिच्छादी, निसीदनं॥
पच्चत्थरणं, वस्सिक-साटिका, मुखपुञ्छनं।
दकसाटि, परिक्खार-चोळं, संकच्चिकापि च॥
यावततियका सब्बे, एकादस पकासिता।
अरिट्ठो, चण्डकाळी च, उक्खित्तस्सानुवत्तिका॥
अट्ठ सङ्घादिसेसेसु, उभिन्नं तु वसा पन।
एकादस इमे याव-ततियाति पकासिता॥
निस्सयस्स दसेकाव, पटिप्पस्सद्धियो पन।
छधाचरियतो वुत्ता, उपज्झाया तु पञ्चधा॥
तेरसेव धुतङ्गानि, परमानि च चुद्दस।
सोळसेव तु ‘‘जान’’न्ति, पञ्ञत्तानि महेसिना॥
सउत्तरं विनयविनिच्छयं तु यो।
महत्तरे विनयनये अनुत्तरे।
निरुत्तरो भवति हि सो, न संसयो॥
तिरच्छानगतानं तु, पुग्गलो गरुभण्डकं।
गण्हन्तो थेय्यचित्तेन, न च पाराजिको सिया॥
अत्तनो सन्तकं दत्वा, भिक्खु पाराजिको कथं?
‘‘मरतू’’ति असप्पाय-भोजनं देति चे चुतो॥
पितरि पितुसञ्ञी च, मातुसञ्ञी च मातरि।
हन्त्वानन्तरियं कम्मं, न फुसेय्य कथं नरो?
तिरच्छानगता माता, तिरच्छानगतो पिता।
तस्मानन्तरियं नत्थि, मारितेसु उभोसुपि॥
अनादियन्तो गरुकं, परञ्च न समादपे।
गच्छं ठितो निसिन्नो वा, कथं पाराजिको भण?
मनुस्सुत्तरिके धम्मे, कत्वान कतिकं ततो।
सम्भावनाधिप्पायो सो, अतिक्कमति चे चुतो॥
सङ्घादिसेसा चत्तारो, भवेय्युं एकवत्थुका।
कथं? कथेहि मे पुट्ठो, विनये चे विसारदो॥
सञ्चरित्तञ्च दुट्ठुल्लं, संसग्गं अत्तकामतं।
इत्थिया पटिपज्जन्तो, फुसेय्य चतुरो इमे॥
सङ्घादिसेसमापन्नो, छादेत्वा सुचिरं पन।
अचरित्वा यथावुत्तं, वत्तं सो वुट्ठितो कथं?
सुक्कविस्सट्ठिमापन्नो , भिक्खुभावे ठितो पन।
परिवत्ते तु लिङ्गस्मिं, नत्थि सङ्घादिसेसता॥
वण्णस्मिं भञ्ञमाने यो, तित्थियानं तु कुज्झति।
आराधको, सम्बुद्धस्स, यदि कुज्झति निन्दितो॥
अत्थङ्गते तु सूरिये, भोजनं भिक्खु भुञ्जति।
न खित्तचित्तोनुम्मत्तो, निरापत्ति कथं भवे?
यो च रोमन्थयित्वान, रत्तिं घसति भोजनं।
नत्थि तस्स पनापत्ति, विकालभोजनेन हि॥
अत्थङ्गते च सूरिये, गहेत्वा भिक्खु भोजनं।
सचे भुञ्जेय्य आपत्ति, अनापत्ति कथं भवे?
विकालुत्तरकुरुं गन्त्वा, तत्थ लद्धान भोजनं।
आगन्त्वा इध कालेन, नत्थि आपत्ति भुञ्जतो॥
गामे वा यदि वारञ्ञे, यं परेसं ममायितं।
न हरन्तोव तं थेय्या, कथं पाराजिको सिया?
थेय्यसंवासको नाम, लिङ्गसंवासथेनको।
परभण्डं अगण्हन्तो, होति एस पराजितो॥
नारी रूपवती बाला, भिक्खु रत्तेन चेतसा।
मेथुनं ताय कत्वापि, सो न पाराजिको कथं?
भिक्खु रूपवतिं नारिं, सुपिनन्तेन पस्सति।
ताय मेथुनसंयोगे, कतेपि न विनस्सति॥
एकिस्सा द्वे सियुं पुत्ता, जाता इध पनित्थिया।
द्विन्नं माता पिता साव, कथं होति भणाहि मे?
उभतोब्यञ्जना इत्थी, गब्भं गण्हाति अत्तना।
गण्हापेति परं गब्भं, तस्मा माता पिता च सा॥
पुरिसेन सहागारे, रहो वसति भिक्खुनी।
परामसति तस्सङ्गं, अनापत्ति कथं सिया?
सहागारिकसेय्यञ्च, सब्बञ्च पटिजग्गनं।
दारकस्स च माता हि, कातुं लभति भिक्खुनी॥
को च भिक्खूहि सिक्खासु, असाधारणतं गतो।
न पारिवासिको ब्रूहि, न उक्खित्तादिकोपि च?
गहेतुं खुरभण्डं तु, सचे न्हापितपुब्बको।
न सो लभति अञ्ञेसं, कप्पतीति च निद्दिसे॥
कथेति कुसलं धम्मं, परमं अत्थसंहितं।
कतमो पुग्गलो ब्रूहि, न मतो न च जीवति?
कथेति कुसलं धम्मं, परमं अत्थसंहितं।
होति निम्मितबुद्धो सो, न मतो न च जीवति॥
संयाचिकं करोन्तस्स, कुटिं देसितवत्थुकं।
पमाणिकमनारम्भं, आपत्ति सपरिक्कमं॥
नरो करोति चे कुटिं, स सब्बमत्तिकामयं।
न मुच्चतेव वज्जतो, जिनेन वुत्ततो ततो॥
संयाचिकाय भिक्खुस्स, अनापत्ति कथं सिया।
सब्बलक्खणहीनं तु, करोन्तस्स कुटिं पन?
संयाचिकं करोन्तस्स, तिणच्छदनकं कुटिं।
भिक्खुनो जिनचन्देन, अनापत्ति पकासिता॥
न कायिकं कञ्चि पयोगमाचरे।
न किञ्चि वाचाय परं भणेय्य।
फुसे गरुं अन्तिमवत्थुहेतुकं।
विसारदो चे विनये भणाहि त्वं?
परस्सा पन या वज्जं, पटिच्छादेति भिक्खुनी।
अयं पाराजिकापत्तिं, तन्निमित्तं गरुं फुसे॥
न कायिकं किञ्चिपि पापमाचरे।
न किञ्चि वाचाय चरेय्य पापकं।
सुनासितोयेव च नासितो सिया।
कथं तुवं ब्रूहि मयासि पुच्छितो?
अभब्बा पन ये वुत्ता, पुग्गला पण्डकादयो।
एकादस मुनिन्देन, नासिता ते सुनासिता॥
अनुग्गिरं गिरं किञ्चि, सुभं वा यदि वासुभं।
फुसे वाचसिकं वज्जं, कथं मे पुच्छितो भण?
सन्तिमेव पनापत्तिं, भिक्खु नाविकरेय्य यो।
सम्पजानमुसावादे, दुक्कटं तस्स वण्णितं॥
एकतोउपसम्पन्ना, उभो तासं तु हत्थतो।
चीवरं गण्हतो होन्ति, नानाआपत्तियो कथं?
एकतोउपसम्पन्ना , भिक्खूनं तु वसेन या।
चीवरं हत्थतो तस्सा, पाचित्ति पटिगण्हतो॥
एकतोउपसम्पन्ना, भिक्खुनीनं वसेन या।
चीवरं हत्थतो तस्सा, दुक्कटं पटिगण्हतो॥
संविधाय च चत्तारो, गरुं थेनिंसु भण्डकं।
थेरो थुल्लच्चयं तेसु, पत्तो, सेसा पराजयं॥
कथं ? छमासकं भण्डं, तत्थ साहत्थिका तयो।
हटा थेरेन मासा तु, तयो आणत्तियापि च॥
बहिद्धा गेहतो भिक्खु, इत्थी गब्भन्तरं गता।
छिद्दं गेहस्स नो अत्थि, मेथुनपच्चया चुतो॥
अन्तोदुस्सकुटिट्ठेन, मातुगामेन मेथुनं।
सन्थतादिवसेनेव, कत्वा होति पराजितो॥
सप्पिआदिं तु भेसज्जं, गहेत्वा साममेव तं।
अवीतिवत्ते सत्ताहे, कथं आपत्ति सेवतो?
परिवत्तितलिङ्गस्स, भिक्खुनो इतराय वा।
अवीतिवत्ते सत्ताहे, होति आपत्ति सेवतो॥
निस्सग्गियेन पाचित्ति, सुद्धपाचित्तियम्पि च।
एकतोव कथं भिक्खु, आपज्जेय्य भणाहि मे?
सङ्घे परिणतं लाभं, अत्तनो च परस्स च।
एकतो परिणामेन्तो, पयोगेन द्वयं फुसे॥
भिक्खू समागम्म समग्गसञ्ञा।
सब्बे करेय्युं पन सङ्घकम्मं।
भिक्खुट्ठितो द्वादसयोजनस्मिं।
कथं कतं कुप्पति वग्गहेतु?
अत्थि सचे पन भिक्खु निसिन्नो।
सङ्घाटि पारुता काये, निवत्थोन्तरवासको।
निस्सग्गियानि सब्बानि, कथं होन्ति कथेहि मे?
कण्णं गहेत्वा तत्थेव, कद्दमं यदि धोवति।
भिक्खुनी कायङ्गानेव, तानि निस्सग्गियानि हि॥
पुरिसं अपितरं हन्त्वा, इत्थिं हन्त्वा अमातरं।
आनन्तरियकं कम्मं, आपज्जति कथं नरो?
परिवत्ते तु लिङ्गस्मिं, पितरं इत्थितं गतं।
मातरं पुरिसत्तं तु, गतं हन्त्वा गरुं फुसे॥
मातरं पन मारेत्वा, मारेत्वा पितरम्पि च।
आनन्तरियकं कम्मं, नापज्जेय्य कथं नरो?
तिरच्छानगता माता, तिरच्छानगतो पिता।
मातरं पितरं हन्त्वा, नानन्तरियकं फुसे॥
चोदेत्वा सम्मुखीभूतं, सङ्घो कम्मं करेय्य चे।
कथं कम्मं अकम्मं तं, सङ्घो सापत्तिको सिया?
वुत्तं तु पण्डकादीनं, सन्धाय उपसम्पदं।
अनापत्तिस्स कम्मं तु, सन्धायाति कुरुन्दियं॥
कप्पबिन्दुकतं रत्तं, चीवरं तु अधिट्ठितं।
कथमस्स सियापत्ति, सेवमानस्स दुक्कटं?
सकं अनिस्सजित्वान, यो निस्सग्गियचीवरं।
परिभुञ्जति तस्साय-मापत्ति परिदीपिता॥
पञ्च पाचित्तियानेव, नानावत्थुकतानि हि।
अपुब्बं अचरिमं एक-क्खणे आपज्जते कथं?
भेसज्जानि हि पञ्चेव, गहेत्वा भाजने विसुं।
ठपितेसु च सत्ताहा-तिक्कमे होन्ति पञ्चपि॥
न रत्तचित्तो न च थेय्यचित्तो।
न चापि चित्तं मरणाय तस्स।
देन्तस्स पाराजिकमाह सत्था।
थुल्लच्चयं तं पटिगण्हतोपि॥
सलाकं सङ्घभेदाय, पदेन्तस्स पराजयो।
होति थुल्लच्चयं तस्स, सलाकं पटिगण्हतो॥
एकत्थ निक्खिपित्वान, चीवरं अद्धयोजने।
अरुणं उट्ठापेन्तस्स, अनापत्ति कथं सिया?
सुप्पतिट्ठितनिग्रोध-सदिसे रुक्खमूलके।
अनापत्ति हि सो रुक्खो, होति एककुलस्स चे॥
नानित्थीनं तु केसे वा, तासं अङ्गुलियोपि वा।
एकतो गहणे तस्स, होन्ति सम्बहुला पन॥
कथं वाचसिका नाना-वत्थुकायो न कायिका।
अपुब्बं अचरिमं एक-क्खणे आपत्तियो फुसे?
दुट्ठुल्लं यो वदति च वाचं।
‘‘सब्बा तुम्हे सिखरणियो’’ति।
इत्थिया पुरिसेनापि, पण्डकेन निमित्तके।
मेथुनं न च सेवन्तो, मेथुनप्पच्चया चुतो?
मेथुने पुब्बभागं तु, कायसंसग्गतं गता।
मेथुनप्पच्चया छेज्जं, आपन्ना अट्ठवत्थुकं॥
मातरं चीवरं याचे, सङ्घे परिणतं न च।
केनस्स होति आपत्ति, अनापत्ति च ञातके?
वस्ससाटिकलाभत्थं , समये पिट्ठिसञ्ञिते।
सियापत्ति सतुप्पादं, करोतो मातरम्पि च॥
सङ्घादिसेसमापत्तिं, पाचित्तिं दुक्कटं कथं।
पाटिदेसनियं थुल्ल-च्चयं एकक्खणे फुसे?
पिण्डं गहेत्वा लसुणं पणीतं।
मनुस्समंसञ्च अकप्पमञ्ञं।
सब्बेकतो खादति, होन्ति तस्सा॥
आचरियको द्वेपि च पुण्णवस्सा।
एकस्स कम्मं तु न रूहते किं?
केसग्गमत्तम्पि महिद्धिकेसु।
कतम्पि तं रूहति नेव कम्मं।
सङ्घेनपि हि आकासे, ठितेन पन इद्धिया।
भूमिगस्स न कातब्बं, करोति यदि कुप्पति॥
न च कप्पकतं वत्थं, न च रत्तं अकप्पियं।
निवत्थस्स पनापत्ति, अनापत्ति कथं सिया?
अच्छिन्नचीवरस्सेत्थ, भिक्खुस्स पन किञ्चिपि।
न चस्साकप्पियं नाम, चीवरं पन विज्जति॥
न कुतोपि च गण्हति किञ्चि हवे।
न तु देति च किञ्चिपि भोजनतो।
गरुकं पन वज्जमुपेति कथं।
आदाय यं किञ्चि अवस्सुतम्हा।
उय्योजिता भुञ्जति भोजनञ्चे।
उय्योजिता या पन याय तस्सा।
सङ्घादिसेसं कथयन्ति धीरा॥
कस्सचि किञ्चि न देति सहत्था।
नेव च गण्हति किञ्चि कुतोचि।
वज्जमुपेति लहुं, न गरुं तु।
ब्रूहि कथं यदि बुज्झसि साधु?
दन्तपोनोदकानं तु, गहणे पन भिक्खुनी।
उय्योजेन्ती लहुं वज्जं, आपज्जति निसेविते॥
आपज्जति पनापत्तिं, गरुकं सावसेसकं।
छादेति, न फुसे वज्जं, कथं जानासि मे वद?
सङ्घादिसेसमापत्तिं, आपज्जित्वा अनादरो।
छादेन्तोपि तमापत्तिं, नाञ्ञं उक्खित्तको फुसे॥
सप्पाणप्पाणजं नेव, जङ्गमं न विहङ्गमं।
द्विजं कन्तमकन्तञ्च, सचे जानासि मे वद?
भूतं परम्परञ्चेव, मुखद्वारमचेलको।
भिक्खुनीसु च अक्कोसो, दस वेसालियं कता॥
दुतियन्तिमवत्थुञ्च, द्वे अनुद्धंसनानि च।
सङ्घभेदा दुवे चेव, चीवरस्स पटिग्गहो॥
रूपियं सुत्तविञ्ञत्ति, तथा उज्झापनम्पि च।
परिपाचितपिण्डो च, तथेव गणभोजनं॥
विकालभोजनञ्चेव, चारित्तं न्हानमेव च।
ऊनवीसतिवस्सञ्च, दत्वा सङ्घेन चीवरं॥
वोसासन्ती च नच्चं वा, गीतं वा चारिकद्वयं।
छन्ददानेनिमे राज-गहस्मिं एकवीसति॥
कुटि कोसियसेय्यञ्च, पथवीभूतगामकं।
सप्पाणकञ्च सिञ्चन्ति, एते छाळवियं कता॥
महल्लकविहारो च, दोवचस्सं तथेव च।
अञ्ञेनञ्ञं तथा द्वार-कोसा मज्झञ्च पञ्चमं॥
अनादरियं सहधम्मो, पयोपानञ्च सेखिये।
कोसम्बियं तु पञ्ञत्ता, अट्ठिमे सुद्धदिट्ठिना॥
धोवनेळकलोमानि, पत्तो च दुतियो पन।
ओवादोपि च भेसज्जं, सूचि आरञ्ञकेसु च॥
उदकसुद्धिकञ्चेव, ओवादागमनम्पि च।
पुरे कपिलवत्थुस्मिं, पञ्ञत्ता पन अट्ठिमे॥
जोतिं समादहित्वान, सामिसेन ससित्थकं।
इमे भग्गेसु पञ्ञत्ता, तयो आदिच्चबन्धुना॥
पाराजिकानि चत्तारि, गरुका सोळसा, दुवे।
अनियता, चतुत्तिंस, होन्ति निस्सग्गियानि हि॥
छप्पण्णाससतञ्चेव , खुद्दकानि भवन्ति हि।
दसेव पन गारय्हा, द्वेसत्तति च सेखिया॥
छऊनानि च तीणेव, सतानि समचेतसा।
इमे वुत्तावसेसा हि, सब्बे सावत्थियं कता॥
पाराजिकानि चत्तारि, सत्त सङ्घादिसेसका।
निस्सग्गियानि अट्ठेव, द्वत्तिंसेव च खुद्दका॥
द्वे गारय्हा, तयो सेखा, छप्पञ्ञासेव सब्बसो।
भवन्ति छसु पञ्ञत्ता, नगरेसु च पिण्डिता॥
सब्बानेव पनेतानि, नगरेसु च सत्तसु।
अड्ढुड्ढानि सतानेव, पञ्ञत्तानि भवन्ति हि॥
सिक्खापदानि भिक्खूनं, वीसञ्च द्वे सतानि च।
भिक्खुनीनं तु चत्तारि, तथा तीणि सतानि च॥
पाराजिकानि चत्तारि, गरुका पन तेरस।
अनियता दुवे वुत्ता, तिंस निस्सग्गियानि च॥
खुद्दका नवुति द्वे च, चत्तारो पाटिदेसना।
निप्पपञ्चेन निद्दिट्ठा, पञ्चसत्तति सेखिया॥
द्वे सतानि च वीसञ्च, वसा भिक्खूनमेव च।
सिक्खापदानि उद्देसमागच्छन्ति उपोसथे॥
पाराजिकानि अट्ठेव, गरुका दस सत्त च।
निस्सग्गियानि तिंसेव, छसट्ठि च सतम्पि च॥
खुद्दकानट्ठ गारय्हा, पञ्चसत्तति सेखिया।
सब्बानि पन चत्तारि, तथा तीणि सतानि च॥
भवन्ति पन एतानि, भिक्खुनीनं वसा पन।
सिक्खापदानि उद्देसमागच्छन्ति उपोसथे॥
छचत्तालीस होन्तेव, भिक्खूनं भिक्खुनीहि तु।
असाधारणभावं तु, गमितानि महेसिना॥
छ च सङ्घादिसेसा च, तथा अनियता दुवे।
द्वादसेव च निस्सग्गा, द्वावीसति च खुद्दका॥
चत्तारोपि च गारय्हा, छचत्तालीस होन्तिमे।
भिक्खूनंयेव पञ्ञत्ता, गोतमेन यसस्सिना॥
विसट्ठि कायसंसग्गो, दुट्ठुल्लं अत्तकामता।
कुटि चेव विहारो च, छळेते गरुका सियुं॥
निस्सग्गियादिवग्गस्मिं, धोवनञ्च पटिग्गहो।
एळकलोमवग्गेपि, आदितो पन सत्त च॥
ततियेपि च वग्गस्मिं, पत्तो च पठमो तथा।
वस्ससाटिकमारञ्ञ-मिति द्वादस दीपिता॥
पाचित्तियानि वुत्तानि, सब्बानि गणनावसा।
भिक्खूनं भिक्खुनीनञ्च, अट्ठासीतिसतं, ततो॥
सब्बो भिक्खुनिवग्गोपि, सपरम्परभोजनो।
तथा अनतिरित्तो च, अभिहट्ठुं पवारणा॥
पणीतभोजनविञ्ञत्ति, तथेवाचेलकोपि च।
निमन्तितो सभत्तो च, दुट्ठुल्लच्छादनम्पि च॥
ऊनवीसतिवस्सं तु, मातुगामेन सद्धिपि।
अन्तेपुरप्पवेसो च, वस्ससाटि निसीदनं॥
खुद्दकानि पनेतानि, द्वावीसति भवन्ति हि।
चत्तारो पन गारय्हा, भिक्खूनं पातिमोक्खके॥
एकतो पन पञ्ञत्ता, छचत्तालीस होन्तिमे।
भिक्खुनीहि तु भिक्खूनं, असाधारणतं गता॥
भिक्खूहि भिक्खुनीनञ्च, सतं तिंस भवन्ति हि।
असाधारणभावं तु, गमितानि महेसिना॥
पाराजिकानि चत्तारि, दस सङ्घादिसेसका।
द्वादसेव च निस्सग्गा, खुद्दका नवुतिच्छ च॥
अट्ठेव पन गारय्हा, सतं तिंस भवन्तिमे।
भिक्खुनीनञ्च भिक्खूहि, असाधारणतं गता॥
भिक्खुनीनं तु सङ्घादि-सेसेहि छ पनादितो।
यावततियका चेव, चत्तारोति इमे दस॥
अकालचीवरञ्चेव, तथा अच्छिन्नचीवरं।
सत्तञ्ञदत्थिकादीनि, पत्तो चेव गरुं लहुं॥
द्वादसेव पनेतानि, भिक्खुनीनं वसेनिध।
निस्सग्गियानि सत्थारा, पञ्ञत्तानि पनेकतो॥
असाधारणपञ्ञत्ता, खुद्दका नवुतिच्छ च।
गारय्हा च पनट्ठाति, सब्बेव गणनावसा॥
भिक्खुनीनं तु भिक्खूहि, असाधारणतं गता।
एकतोयेव पञ्ञत्ता, सतं तिंस भवन्ति हि॥
असाधारणुभिन्नम्पि, सतं सत्तति चच्छ च।
पाराजिकानि चत्तारि, गरुका च दसच्छ च॥
अनियता दुवे चेव, निस्सग्गा चतुवीसति।
सतं अट्ठारसेवेत्थ, खुद्दका परिदीपिता॥
द्वादसेव च गारय्हा, सतं सत्तति चच्छ च।
असाधारणुभिन्नम्पि, इमेति परिदीपिता॥
साधारणा उभिन्नम्पि, पञ्ञत्ता पन सत्थुना।
सतं सत्तति चत्तारि, भवन्तीति पकासिता॥
पाराजिकानि चत्तारि, सत्त सङ्घादिसेसका।
अट्ठारस च निस्सग्गा, समसत्तति खुद्दका॥
पञ्चसत्तति पञ्ञत्ता, सेखियापि च सब्बसो।
सतं सत्तति चत्तारि, उभिन्नं समसिक्खता॥
केवला पन पञ्ञत्ति, मूलभूता तथेव सा।
अन्वनुप्पन्नसब्बत्थ-पदेसपदपुब्बिका॥
साधारणा च पञ्ञत्ति, तथासाधारणापि च।
एकतोउभतोपुब्बा, एवं नवविधा सिया॥
तत्थ ‘‘यो मेथुनं धम्मं, पटिसेवेय्य भिक्खु’’ति।
‘‘अदिन्नं आदियेय्या’’ति, पञ्ञत्तिच्चेवमादिका॥
होति ‘‘अन्तमसो भिक्खु, तिरच्छानगतायपि’’।
इच्चेवमादिका सब्बा, अनुपञ्ञत्ति दीपिता॥
तथानुप्पन्नपञ्ञत्ति, अनुप्पन्ने तु वज्जके।
अट्ठन्नं गरुधम्मानं, वसेनेवागता हि सा॥
चम्मत्थरणकञ्चेव, सगुणङ्गुणुपाहनं।
तथेव च धुवन्हानं, पञ्चवग्गूपसम्पदा॥
एसा पदेसपञ्ञत्ति, नामाति हि चतुब्बिधा।
वुत्ता मज्झिमदेसस्मिं-येव होति, न अञ्ञतो॥
इतो सेसा हि सब्बत्थ-पञ्ञत्तीति पकासिता।
अत्थतो एकमेवेत्थ, साधारणदुकादिकं॥
साणत्तिका पनापत्ति, होति नाणत्तिकापि च।
आणत्तीति च नामेसा, ञेय्या आणापना पन॥
आपत्तीनं तु सब्बासं, सब्बसिक्खापदेसुपि।
सब्बो पनङ्गभेदो हि, विञ्ञातब्बो विभाविना॥
कायेनपि च वाचाय, या करोन्तस्स जायते।
अयं क्रियसमुट्ठाना, नाम पाराजिका विय॥
कायवाचाहि कत्तब्बं, अकरोन्तस्स होति या।
सा चाक्रियसमुट्ठाना, पठमे कथिने विय॥
करोन्तस्साकरोन्तस्स, भिक्खुनो होति या पन।
सा क्रियाक्रियतो होति, चीवरग्गहणे विय॥
सिया पन करोन्तस्स, अकरोन्तस्स या सिया।
सा क्रियाक्रियतो होति, रूपियुग्गहणे विय॥
सञ्ञाविमोक्खा नोसञ्ञा-।
वीतिक्कमनसञ्ञाय, अभावेन यतो पन।
विमुच्चति अयं सञ्ञा-विमोक्खाति पकासिता॥
इतरा पन नोसञ्ञा-विमोक्खाति पकासिता।
पुन सब्बाव चित्तस्स, वसेन दुविधा सियुं॥
सचित्तका अचित्ताति, सुचित्तेन पकासिता।
सचित्तकसमुट्ठान-वसेन पन या सिया॥
अयं सचित्तका नाम, आपत्ति परिदीपिता।
सचित्तकेहि वा मिस्स-वसेनायमचित्तका॥
सब्बा चापत्तियो वज्ज-वसेन दुविधा रुता।
सुविज्जेनानवज्जेन, लोकपण्णत्तिवज्जतो॥
यस्सा सचित्तके पक्खे, चित्तं अकुसलं सिया।
लोकवज्जाति नामायं, सेसा पण्णत्तिवज्जका॥
सब्बा चापत्तियो कम्म-वसेन तिविधा सियुं।
कायकम्मं वचीकम्मं, तथा तदुभयम्पि च॥
तिकद्वयन्ति नामेतं, कुसलादितिकद्वयं।
कुसलाकुसलचित्तो वा, तथाब्याकतमानसो॥
हुत्वा आपज्जतापत्तिं, आपज्जन्तो न अञ्ञथा।
सुखवेदनासमङ्गी वा, तथा दुक्खादिसंयुतो॥
इदं तु लक्खणं वुत्तं, सब्बसिक्खापदेसुपि।
योजेत्वा पन दस्सेय्य, विनयस्मिं विसारदो॥
चतुस्सिखं सत्तफलं छपुप्फं।
जानाति यो द्विप्पभवं द्विसाखं।
जानाति पञ्ञत्तिमसेसतो सो॥
परियापुणाति परिपुच्छति यो।
सोळसपरिवारस्स, परिवारस्स सब्बसो।
इतो परं पवक्खामि, सब्बसङ्कलनं नयं॥
कायिका छब्बिधापत्ति, तथा वाचसिकापि च।
छादेन्तस्स च तिस्सोव, पञ्च संसग्गपच्चया॥
कति आपत्तिमूलानि, पञ्ञत्तानि महेसिना?
कति आपत्तियो वुत्ता, दुट्ठुल्लच्छादने पन?
द्वे पनापत्तिमूलानि, कायो वाचा भवन्ति हि।
पाराजिका च पाचित्ति, दुट्ठुल्लच्छादने सियुं॥
कति गामन्तरे वुत्ता, नदीपारे तथा कति?
कति थुल्लच्चयं मंसे, कति मंसेसु दुक्कटं?
गामन्तरे चतस्सोव, नदीपारेपि तत्तका।
थुल्लच्चयं मनुस्सानं, मंसे, नवसु दुक्कटं॥
भिक्खु भिक्खुनिया सद्धिं, संविधाति च दुक्कटं।
पाचित्तञ्ञस्स गामस्स, उपचारोक्कमे सिया॥
थुल्लच्चयं परिक्खित्ते, गामस्मिं पठमे पदे।
गरुकं दुतिये तस्सा, गामन्तरं वजन्तिया॥
तथा भिक्खुनिया सद्धिं, संविधाने तु दुक्कटं।
अभिरूहति नावं चे, होति पाचित्ति भिक्खुनो॥
नदियुत्तरणे काले, पादे थुल्लच्चयं फुसे।
पठमे, दुतिये तस्सा, होति भिक्खुनिया गरुं॥
कति वाचसिका रत्तिं, कति वाचसिका दिवा?
दुवे वाचसिका रत्तिं, दुवे वाचसिका दिवा॥
रत्तन्धकारे पुरिसेन सद्धिं।
पाचित्ति तस्सा यदि सल्लपेय्य।
वदेय्य चे दुक्कटमेव दूरे॥
छन्ने दिवा या पुरिसेन सद्धिं।
ठिता वदेय्यस्स च हत्थपासे।
पाचित्ति, हित्वा पन हत्थपासं।
वदेय्य चे दुक्कटमेव तस्सा॥
कति वा ददमानस्स, कति वा पटिगण्हतो?
ददमानस्स तिस्सोव, चतस्सोव पटिग्गहे॥
मनुस्सस्स विसं देति, सचे मरति तेन सो।
होति पाराजिकं, यक्खे, पेते थुल्लच्चयं मतं॥
तिरच्छानगते तेन, मते पाचित्तियं सिया।
तथा पाचित्ति अञ्ञाति-काय चे देति चीवरं॥
हत्थगाहे तथा वेणि-गाहे सङ्घादिसेसता।
मुखेन अङ्गजातस्स, गहणे तु पराजयो॥
अञ्ञातिकाय हत्थम्हा, चीवरस्स पटिग्गहे।
सनिस्सग्गा च पाचित्ति, होतीति परियापुता॥
अवस्सुतस्स हत्थम्हा, सयं वापि अवस्सुता।
होति थुल्लच्चयं तस्सा, भोजनं पटिगण्हतो॥
कति ञत्तिचतुत्थेन, वुत्ता सम्मुतियो इध?
एका एव पनुद्दिट्ठा, भिक्खुनोवादसम्मुति॥
कति धञ्ञरसा वुत्ता, विकाले कप्पिया पन?
लोणसोवीरकं एकं, विकाले कप्पियं मतं॥
कति पाराजिका काया, कति संवासभूमियो?
रत्तिच्छेदो कतीनं तु, पञ्ञत्ता द्वङ्गुला कति?
पाराजिकानि कायम्हा, द्वे द्वे संवासभूमियो।
रत्तिच्छेदो दुविन्नं तु, पञ्ञत्ता द्वङ्गुला दुवे॥
पठमन्तिमवत्थुञ्च, कायसंसग्गजम्पि च।
पाराजिकानि कायम्हा, इमे द्वे पन जायरे॥
महेसिना कारुणिकेन वुत्ता॥
पारिवासिकभिक्खुस्स , तथा मानत्तचारिनो।
रत्तिच्छेदो दुविन्नं तु, द्वयातीतेन दीपितो॥
द्वङ्गुलपब्बपरमं, आदातब्बं, तथेव च।
द्वङ्गुलं वा दुमासं वा, पञ्ञत्ता द्वङ्गुला दुवे॥
कति पाणातिपातस्मिं, वाचा पाराजिका कति?
कति ओभासने वुत्ता, सञ्चरित्ते तथा कति?
अनोदिस्सकमोपाते, खते मरति मानुसो।
पाराजिकं सिया, यक्खे, पेते थुल्लच्चयं मते॥
तिरच्छानगते तत्थ, मते पाचित्तियं वदे।
इमा पाणातिपातस्मिं, तिस्सो आपत्तियो सियुं॥
मनुस्समारणादिन्ना-दानमाणत्तियापि च।
मनुस्सुत्तरिधम्मञ्च, वदतो वाचिका तयो॥
मग्गद्वयं पनोदिस्स, वण्णादिभणने गरुं।
थुल्लच्चयं पनोदिस्स, उब्भजाणुमधक्खकं॥
उब्भक्खकमधोजाणु-मादिस्स भणतो पन।
दुक्कटं पन निद्दिट्ठं, तिस्सो ओभासना यिमा॥
पटिग्गण्हनतादीहि, तीहि सङ्घादिसेसता।
द्वीहि थुल्लच्चयं वुत्तं, एकेन पन दुक्कटं॥
छिन्दतो कति आपत्ति, छड्डितप्पच्चया कति?
छिन्दन्तस्स तु तिस्सोव, पञ्च छड्डितपच्चया॥
होति पाराजिकं तस्स, छिन्दन्तस्स वनप्पतिं।
भूतगामं तु पाचित्ति, अङ्गजातं तु थुल्लता॥
विसं छड्डेत्यनोदिस्स, मनुस्सो मरति तेन चे।
पाराजिकं, मते यक्खे, पेते थुल्लच्चयं सिया॥
तिरच्छाने तु पाचित्ति, विसट्ठिछड्डने गरुं।
हरितुच्चारपस्साव-छड्डने दुक्कटं मतं॥
गच्छतो कतिधापत्ति, ठितस्स कति मे वद?
कति होन्ति निसिन्नस्स, निपन्नस्सापि कित्तका?
गच्छन्तस्स चतस्सोव, ठितस्सापि च तत्तका।
निसिन्नस्स चतस्सोव, निपन्नस्सापि तत्तका॥
भिक्खु भिक्खुनिया सद्धिं, संविधाने तु दुक्कटं।
पाचित्तञ्ञस्स गामस्स, उपचारोक्कमे सिया॥
थुल्लच्चयं परिक्खित्ते, गामस्मिं पठमे पदे।
गरुकं दुतिये होति, गामन्तरं वजन्तिया॥
पटिच्छन्ने पनोकासे, भिक्खुनी मित्तसन्थवा।
पोसस्स हत्थपासे तु, पाचित्ति यदि तिट्ठति॥
हत्थपासं जहित्वान, सचे तिट्ठति दुक्कटं।
अरुणुग्गमने काले, दुतिया हत्थपासकं॥
हित्वा तिट्ठन्तिया तस्सा, थुल्लच्चयमुदीरितं।
हित्वा तिट्ठति चे तस्सा, होति सङ्घादिसेसता॥
निसिन्नाय चतस्सोव, निपन्नायापि तत्तका।
होन्ति वुत्तप्पकाराव, विञ्ञेय्या विनयञ्ञुना॥
यावततियके वुत्ता, कति आपत्तियो वद?
यावततियके वुत्ता, तिस्सो आपत्तियो सुण॥
फुसे पाराजिकापत्तिं, उक्खित्तस्सानुवत्तिका।
सङ्घादिसेसता सङ्घ-भेदकस्सानुवत्तिनो॥
अनिस्सग्गे तु पाचित्ति, पापिकाय च दिट्ठिया।
यावततियके तिस्सो, होन्ति आपत्तियो इमा॥
खादतो कति निद्दिट्ठा, भोजनप्पच्चया कति?
खादतो पन तिस्सोव, पञ्च भोजनकारणा॥
थुल्लच्चयं मनुस्सानं, मंसं खादति, दुक्कटं।
सेसकानं तु, पाचित्ति, लसुणं भक्खयन्तिया॥
अवस्सुतस्स पोसस्स, हत्थतो हि अवस्सुता।
गहेत्वा भोजनं किञ्चि, सब्बं मंसं अकप्पियं॥
विञ्ञापेत्वान अत्तत्थं, गहेत्वा भोजनम्पि च।
लसुणम्पि च मिस्सेत्वा, एकतज्झोहरन्तिया॥
थुल्लच्चयञ्च पाचित्ति, पाटिदेसनियम्पि च।
दुक्कटं गरुकञ्चाति, पञ्च आपत्तियो सियुं॥
ओलोकेन्तस्स निद्दिट्ठा, कति आपत्तियो वद?
ओलोकेन्तस्स निद्दिट्ठा, एकापत्ति महेसिना॥
दुक्कटं रत्तचित्तेन, अङ्गजातं पनित्थिया।
ओलोकेन्तस्स वा वुत्तं, मुखं भिक्खं ददन्तिया॥
कति उक्खित्तका वुत्ता, सम्मावत्तनका कति?
तयो उक्खित्तका वुत्ता, तेचत्तालीस वत्तना॥
अदस्सनप्पटीकम्मे, आपन्नापत्तिया दुवे।
एको अप्पटिनिस्सग्गे, पापिकाय च दिट्ठिया॥
कति नासितका वुत्ता, कतीनं एकवाचिका?
तयो नासितका वुत्ता, तिण्णन्नं एकवाचिका॥
मेत्तिया दूसको चेव, कण्टकोति तयो इमे।
लिङ्गसंवासदण्डेहि, नासिता हि यथाक्कमं॥
एकुपज्झायकेनेव, एकेनाचरियेन च।
द्वे तयो अनुसावेतुं, वट्टतीति च निद्दिसे॥
ञत्तिया कप्पना चेव, तथा विप्पकतम्पि च।
अतीतकरणञ्चेति, तयो कम्मस्स सङ्गहा॥
ञत्तियाकप्पना नाम, ‘‘ददेय्य’’च्चेवमादिका।
‘‘देति सङ्घो, करोती’’ति, आदि विप्पकतं सिया॥
‘‘दिन्नं, कतं’’ पनिच्चादि, अतीतकरणं सिया।
सङ्गय्हन्ति हि सब्बानि, कम्मानेतेहि तीहिपि॥
सङ्घे सलाकगाहेन, कम्मेनपि च केवलं।
कारणेहि पन द्वीहि, सङ्घो भिज्जति, नञ्ञथा॥
सङ्घभेदकभिक्खुस्स, तस्स पाराजिकं सिया।
अनुवत्तकभिक्खूनं, थुल्लच्चयमुदीरितं॥
पयुत्तायुत्तवाचाय, कति आपत्तियो फुसे?
पयुत्तायुत्तवाचाय, छ पनापत्तियो फुसे॥
आजीवहेतु पापिच्छो, इच्छापकतमानसो।
असन्तं उत्तरिं धम्मं, उल्लपन्तो पराजितो॥
सञ्चरित्तं समापन्ने, तथा सङ्घादिसेसता।
यो ते वसति आरामे, वदं थुल्लच्चयं फुसे॥
विञ्ञापेत्वा पणीतं तु, भोजनं भिक्खु भुञ्जति।
पाचित्ति भिक्खुनिया चे, पाटिदेसनियं सिया॥
विञ्ञापेत्वान सूपं वा, ओदनं वा अनामयो।
भिक्खु भुञ्जति चे तस्स, होति आपत्ति दुक्कटं॥
दससतानि रत्तीनं, छादेत्वापत्तियो पन।
दस रत्तियो वसित्वान, मुच्चेय्य पारिवासिको॥
पाराजिकानि अट्ठेव, तेवीस गरुका पन।
द्वेयेवानियता वुत्ता, बुद्धेनादिच्चबन्धुना॥
निस्सग्गियानि वुत्तानि, द्वेचत्तालीस होन्ति हि।
होन्ति पाचित्तिया सब्बा, अट्ठासीतिसतं पन॥
पाटिदेसनिया वुत्ता, द्वादसेव महेसिना।
वुत्ता पन सुसिक्खेन, पञ्चसत्तति सेखिया॥
पञ्ञत्तानि सुपञ्ञेन, गोतमेन यसस्सिना।
भवन्ति पन सब्बानि, अड्ढुड्ढानि सतानि हि॥
मया सुट्ठु विचारेत्वा, पाळिअट्ठकथानयं।
कतत्ता आदरं कत्वा, उग्गहेतब्बमेविदं॥
अत्थे अक्खरबन्धे वा, विञ्ञासस्स कमेपि वा।
कङ्खा तस्मा न कातब्बा, कातब्बा बहुमानता॥
निस्सयं सो विमुञ्चित्वा।
निस्सयं दातुकामेन, सविभङ्गं समातिकं।
सुट्ठु वाचुग्गतं कत्वा, ञत्वा दातब्बमेविदं॥
इमं पठति चिन्तेति, सुणाति परिपुच्छति।
वाचेति च परं निच्चं, अत्थं उपपरिक्खति॥
यो तस्स पन भिक्खुस्स, अत्था विनयनिस्सिता।
उपट्ठहन्ति सब्बेव, हत्थे आमलकं विय॥
अतो हि निच्चं इममुत्तमं तमं।
विधूय सिक्खे गुणसंहितं हितं।
नरो हि सक्कच्चवपूरतो रतो।
सुखस्स सब्बङ्गणकम्मदं पदं॥
विधिना पटुना पटुना यतिना।
पञ्ञासाधिकसङ्ख्यानि, नवगाथासतानि हि।
गणना उत्तरस्सायं, छन्दसानुट्ठुभेन तु॥
गाथा चतुसहस्सानि, सतञ्च ऊनवीसति।
पमाणतो इमा वुत्ता, विनयस्स विनिच्छयेति॥
इति तम्बपण्णियेन परमवेय्याकरणेन तिपिटकनयविधिकुसलेन परमकविजनहदयपदुमवनविकसनकरेन कविवरवसभेन परमरतिकरवरमधुरवचनुग्गारेन उरगपुरेन बुद्धदत्तेन रचितो उत्तरविनिच्छयो समत्तोति।